छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 50 सीटें मिली थीं, जिनमें बस्तर क्षेत्र की 11 सीटें भी शामिल थीं। बस्तर की एकमात्र कोंटा सीट से कांग्रेस के कवासी लकमा विजयी हुए थे।
छत्तीसढ़ के राज्य बनने के बाद से राजनीतिक पंडितों का आकलन रहा है कि जिसने बस्तर जीत लिया, उसने राज्य जीत लिया।
छत्तीसगढ़ के पहले विधानसभा चुनाव 2003 में हुए थे और उसमें भाजपा ने बस्तर की 12 सीटों में से 9 सीटों पर कब्जा जमाया था और सरकार बनाने में सफल हुई थी। तो क्या 2013 में नई सरकार के गठन की चाबी भी बस्तर के हाथ में है?
राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं कि इस बार भाजपा को बस्तर की सभी 12 सीटें मिलेंगी और सरकार भी वही बनाएगी।
रमन सिंह का दावा है कि साठ वर्षों में जो कुछ नहीं हुआ वह भाजपा ने दस वर्ष में कर दिखाया है।
यदि बस्तर को इन चुनावों में भी अहम माना जा रहा है, तो उसकी वजह भी है। वास्तव में बस्तर की कुल 12 सीटों को अलग कर दिया जाए तो छत्तीसगढ़ विधानसभा की एक अलग ही तस्वीर सामने आती है।
कांग्रेस को 2008 में 39 सीटें मिली थीं। इस तरह देखा जा सकता है कि पिछली बार के आंकड़ों में से यदि बस्तर की 12 सीटों को अलग कर दिया जाए, तो पता चलेगा कि शेष छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही 38-38 सीटें मिली थीं!
इससे भी दिलचस्प यह है कि पिछली बार बस्तर की चार सीटों पर जीत का अंतर 3000 मतों से भी कम था, जिसमें अंतागढ़ में तो महज 109 और कोंटा में 192 मतों का ही अंतर था।
पिछली बार बस्तर के आंकड़ों का एक और पहलू यह भी है कि भाजपा और कांग्रेस के मतों में कुल 1,18512 मतों का ही अंतर था।
भाजपा को यहां 4,69524 मत मिले थे और कांग्रेस को 3,51012 मत मिले थे। वैसे सूबे की पूरी 90 सीटों में से भाजपा और कांग्रेस के कुल मतों में सिर्फ 0.5 फीसदी का ही अंतर था।
भाजपा को कुल पड़े मतों में से 38.9 फीसदी मत मिले थे और कांग्रेस को 38.63 फीसदी। सवाल है कि क्या कांग्रेस यह 0.5 फीसदी का अंतर पाटने में सफल होगी। यदि हम 2008 के बाद हुए चुनावों और उपचुनाव पर नजर डालें तो राह कठिन लगती है।
मसलन संजारी बालोद सीट के भाजपा विधायक मदनलाल साहू के निधन के कारण हुए उपचुनाव में भी भाजपा ने यह सीट बरकरार रखी थी।
यही नहीं, 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में भी राज्य की कुल 11 सीटों में से 10 पर भाजपा जीती थी और एकमात्र कोरबा सीट से अभी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चरणदास महंत विजयी हुए थे।
बस्तर में लोकसभा की दो सीटें हैं, एक कांकेर और दूसरी बस्तर और ये दोनों भी भाजपा के पास ही हैं। भाजपा के दिग्गज आदिवासी नेता बलीराम कश्यप बस्तर से विजयी हुए थे, लेकिन दो वर्ष पहले उनके निधन के कारण उपचुनाव कराना पड़ा था, जिसमें उनके बेटे दिनेश कश्यप विजयी हुए।
इस उप चुनाव में कांग्रेस ने बस्तर के अपने एकमात्र विधायक कवासी लकमा को उम्मीदवार बनाया था, मगर वह 88 हजार मतों से हार गए थे।
इसकी तुलना यदि 2008 के विधानसभा चुनावों से की जाए तो पता चलता है कि कांग्रेस और भाजपा के बस्तर के मतों का अंतर घटा है।
भाजपा को यदि बस्तर में कहीं सर्वाधिक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है तो वह दक्षिण बस्तर की तीन सीटें कोंटा, दंतेवाड़ा और बीजापुर सीट हैं, जहां से कोंटा में अभी उसका विधायक नहीं है। जबकि 2003 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बस्तर की जो तीन सीटें मिली थीं वह कोंटा, दंतेवाड़ा और बीजापुर ही थीं।