छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में शरद पूर्णिमा के अवसर पर कर्मागढ़ स्थित मानकेश्वरी मंदिर में सदियों पुरानी परंपरा के तहत सैकड़ों बकरों की बलि दी गई। ओडिशा सीमा से सटे जंगलों के बीच स्थित इस मंदिर में सुबह से देर शाम तक 10 से 15 हजार श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है और आज भी विशेष पूजा-अर्चना के साथ निभाई जाती है।
सुबह से देर शाम तक चला धार्मिक आयोजन
रायगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित कर्मागढ़ गांव में शरद पूर्णिमा के मौके पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था। बड़ी संख्या में लोग अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद बकरा लेकर मंदिर पहुंचे, जबकि कई श्रद्धालु नई मन्नतें लेकर माता के दरबार में पहुंचे।
मंदिर परिसर में दिनभर धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-अर्चना का सिलसिला चलता रहा। स्थानीय मान्यता के अनुसार, पूजा के दौरान बैगा के शरीर में मां मानकेश्वरी का प्रभाव आता है और उसी परंपरा के तहत बलि की रस्म पूरी की जाती है।
रायगढ़ और ओडिशा से पहुंचे श्रद्धालु
मानकेश्वरी मंदिर समिति के सदस्य युधिष्ठिर यादव ने बताया कि शरद पूर्णिमा पर यहां हर वर्ष विशेष पूजा होती है, जिसमें रायगढ़ के अलावा पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। उन्होंने बताया कि संतान प्राप्ति, बीमारी से मुक्ति और अन्य मनोकामनाएं पूरी होने पर लोग बकरा चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं।
इस बार भी पिछले वर्षों की तुलना में श्रद्धालुओं की संख्या अधिक रही। भीड़ को व्यवस्थित करने के लिए रायगढ़ पुलिस के साथ गांव के युवाओं ने भी व्यवस्था संभाली।
बैगा की अंगूठी से जुड़ी है अनोखी मान्यता
गांव के तेजराम सिदार ने बताया कि मंदिर की स्थापना रायगढ़ राजपरिवार ने कराई थी और तब से यह परंपरा चली आ रही है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, निशा पूजन के दौरान राजपरिवार की ओर से बैगा को एक अंगूठी पहनाई जाती है। बताया जाता है कि सामान्य स्थिति में ढीली रहने वाली यह अंगूठी बलि पूजा के दौरान बैगा की उंगली में कस जाती है, जिसे श्रद्धालु देवी की उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं। यह धार्मिक आस्था स्थानीय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
इतिहास से जुड़ी हैं कई लोककथाएं
ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 1700 ईस्वी में हिमगिरि रियासत के पराजित राजा को जंजीरों में बांधकर जंगल में छोड़ दिया गया था। मान्यता है कि कर्मागढ़ पहुंचने पर मां मानकेश्वरी के आशीर्वाद से वह बंधनमुक्त हुआ।
इसी तरह वर्ष 1780 से जुड़ी एक लोककथा भी प्रचलित है, जिसमें कहा जाता है कि रायगढ़ और हिमगिरि क्षेत्र पर हुए हमले के दौरान मधुमक्खियों और जंगली कीटों के झुंड ने अंग्रेजी सेना पर हमला कर दिया था। ग्रामीण इस घटना को देवी की कृपा से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, ये विवरण स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं पर आधारित हैं।