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जाए तो जाए कहां ये 13 साल की मां?

Fri, 04 Dec 2015 04:32 PM IST
आलोक प्रकाश पुतुल/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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वो अपने नवजात बेटे को अस्पताल छोड़ गांव लौट आई हैं। आप कुछ भी पूछ लें, लगभग सभी सवालों का जवाब उसकी चुप्पी ही होती है। बहुत कुरेदने पर छत्तीसगढ़ी में कहती हैं, “मुझे तो अपने बच्चे का चेहरा भी याद नहीं।”
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छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के एक गांव की 13 साल की इस मां के हिस्से बस चंद तारीखें हैं, कुछ बुरे सपने, पुलिस और सरकारी अफसरों की पूछताछ और घर-बाहर हर तरफ पसरी हुई गरीबी है। इसी साल गांव के ही 22 साल के युवक भरत लाल चौहान ने प्यार का वास्ता देकर 13 साल की इस बच्ची के साथ बलात्कार किया।

बच्ची जब गर्भवती हुई तो बात सामने आई। लेकिन तब तक सात महीने बीत चुके थे। लड़की की मां बताती हैं, “समाज के लोग बैठे। तय हुआ कि भरत मेरी बेटी को अपने साथ रखेगा। लेकिन उसने मेरी बेटी को भगा दिया।”
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मोरगा के थाना प्रभारी गोपाल वैश्य बताते हैं कि अक्टूबर में यह मामला थाने पहुंचा तो उन्होंने दुष्कर्म और 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट' यानी 'पोस्को' के तहत मामला दर्ज किया। फिर अभियुक्त को गिरफ्तार कर उसे जेल भेज दिया गया। वैश्य कहते हैं, 'पीड़िता का परिवार इतना गरीब है कि बच्ची के प्रसव की कौन कहे, दो जून खाना भी नहीं दे सकता। ऐसे में हमने बच्ची को महिला कल्याण केंद्र में रखा और फिर नवंबर में उसे अस्पताल में भर्ती कराया।”

अस्पताल में 13 साल की इस बच्ची ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। लेकिन फिर सवाल वही था कि इस बच्चे का क्या होगा? पीड़िता के परिवार ने बाल कल्याण समिति से अनुरोध किया कि उनका परिवार नवजात की देख-रेख करने में असमर्थ है, इसलिए उसे बाल कल्याण समिति अपना ले।

बेटे को अस्पताल में छोड़कर 13 साल की पीड़िता अपनी मां के साथ गांव लौट आई और पिछले हफ्ते शुक्रवार को बच्चे को एक अनाथालय में भेज दिया गया। सरकारी फाइल में किस्सा यहीं जाकर खत्म हो गया है।
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कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से जगी आस

लेकिन कोरबा के बाल कल्याण समिति के अश्विनी सिन्हा की जानकारी में यह बात है कि इसी महीने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बाराबंकी के ठीक ऐसे ही मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

सिन्हा बताते हैं, “लखनऊ हाईकोर्ट ने पीड़िता को तीन लाख रुपए के अलावा राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि पीड़ित लड़की के नाम 10 लाख रुपए की एफडी कराए। इसके अलावा पीड़िता की मुफ्त शिक्षा, आवास, भोजन की व्यवस्था और पढ़ाई पूरी होने पर सरकारी नौकरी के आदेश भी दिए हैं।”

सिन्हा को लगता है कि इस मामले में किसी समाजसेवी संस्था को हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन राजधानी रायपुर में रहने वाली छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष शताब्दी पांडे का कहना है कि अगर पीड़िता और उसका परिवार सरकार से अनुरोध करे तो सरकारी योजनाओं का लाभ उसे दिया जा सकता है। पांडे कहती हैं, “सारी जिम्मेवारी सरकार को नहीं दी जा सकती। समाज को भी तो अपनी जिम्मेवारी के लिए आगे आना चाहिए।”

राजधानी रायपुर से ढाई सौ किलोमीटर दूर अपने गांव में अपनी 13 साल की पीड़िता बेटी के हाथ को संभाले उसकी मां कहती हैं, “समाज कैसा होता है, इसे हमसे बेहतर कौन जानता है? हमें पता है कि अब पूरी जिंदगी सारा दुख हमे अकेले ही झेलना है।”
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