चंडीगढ़। पहले हम मोबाइल का प्रयोग करते थे तो गर्म होने पर हमें नुकसान पहुंचाता था। लेकिन जब से मोबाइल के नाम पर स्मार्ट फोन का हमारे जीवन में प्रवेश हुआ है स्थिति गंभीर हो गई है। लोग यह जानते ही नहीं कि जब वे चुप रहते हैं उस दौरान भी उनके स्मार्ट फोन एक नहीं दर्जनों जगहों पर बातें करते रहते हैं। स्मार्ट फोन के दर्जनों फीचर 24 घंटे क्रियाशील होते हैं। यह क्रियाशीलता ही हमारे लिए घातक बनती जा रही है। इसकी अति बांझपन का भी कारण बन सकती है। इसलिए युवा वर्ग स्मार्ट फोन के उपयोग को सीमित करें। यह बात देश के जाने-माने बांझपन उपचार विशेषज्ञ और इंडियन फर्टीलिटी सोसाइटी के उपाध्यक्ष डॉ. पंकज तलवार ने सोमवार को सेक्टर-8 में एक कार्यक्रम के दौरान दी।
डॉ. पंकज ने बताया कि स्मार्ट फोन को जेब में रखना पुरुषाें के लिए खतरनाक है। उन्होंने बताया कि बांझपन के बढ़ते मामलों में स्त्री और पुरुष समान रूप से जिम्मेदार हैं। इसलिए बच्चा न होने पर सिर्फ महिला को जिम्मेदार ठहराना गलत है। बांझपन की बढ़ती समस्या पर काबू के लिए सबसे पहले समय पर विवाह करना जरूरी है क्याेंकि एक तरफ तो कॅरिअर को बनाने की चाह में विवाह में विलंब किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कॅरिअर बनाकर बच्चे की चाह में परेशान होना पड़ रहा है। इससे न तो नौकरी ठीक से चल पाती है न ही परिवार और जिंदगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में मौजूदा समय में हर छह में से एक दंपति बांझपन का शिकार है।
कैंसर फर्टीलिटी प्रिजरवेशन से जगी उम्मीद
डॉ. पंकज ने बताया कि कैंसर के बढ़ते मामलों को ध्यान में रखकर ही अब कैंसर फर्टीलिटी प्रिजरवेशन की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। स्तन या अन्य कैंसर से ग्रस्त एक 17 साल की किशोरी की फर्टीलिटी और ओवरी को प्रिजर्व कर उसे अगले 10 साल बाद भी मां बनने का सुख दिया जा सकता है। ठीक ऐसा ही पुरुषों के साथ भी है। ऐसे मामले में पुरुष का स्मर्प प्रिजर्व कर दिया जाता है। बांझपन से डरिए मत, यह एक बीमारी है जिसे इलाज से पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।
सभी मामलों में आईवीएफ ही इलाज नहीं
बांझपन से जुड़ी हर तरह की समस्या में सिर्फ आईवीएफ तकनीक का ही प्रयोग नहीं किया जाता। डॉ. पंकज का कहना है कि 100 में से महज 10 से 15 मामले में ही आईवीएफ तकनीक का प्रयोग किया जाता हे। इसलिए शादी के एक साल के अंदर अगर गर्भ धारण न कर पाए तो देरी करने की बजाय तत्काल डॉक्टर की सलाह लें। डॉ. पंकज ने बताया कि एक लड़की में 20 से 22 साल की उम्र में अंडकोष में अंडे की संख्या 2.5 लाख होती है वहीं 30 से 40 साल के बीच महज 8 हजार रह जाती है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बढ़ती उम्र के साथ बांझपन का खतरा कैसे बढ़ता है।