भारत समेत दुनिया के एक दर्जन देशों के 86 फीसदी लोगों का कहना है कि वह कोरोना वायरस से बचाव के लिए योग का सहारा ले रहे हैं। योग इम्यूनिटी बढ़ाता है। इसके अलावा लॉकडाउन में लोग समय पास करने के लिए सोशल मीडिया का बहुतायत में प्रयोग करते हैं। इनकी संख्या निकलकर 78 फीसदी आई है। लॉकडाउन में लोगों की धार्मिक आस्था प्रभावित नहीं हुई है। वह अपने घरों पर रहकर पूजा-पाठ कर रहे हैं।
यह बातें लॉकडाउन का आम जनमानस पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, इसके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक पहलुओं को लेकर किए गए अंतरराष्ट्रीय सर्वे में सामने आई हैं। यह सर्वेक्षण पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रो. रोशन लाल, प्रो. अनुराधा भंडारी, सीनियर रिसर्च स्कॉलर डॉ. अमित कुमार व पीजीजीसीजी कॉलेज सेक्टर 11 की डॉ. रितु सेखरी ने ऑनलाइन किया है। सर्वेक्षण 21 अप्रैल से 28 अप्रैल के मध्य चला। इसमें 30 प्रश्नों के जवाब मांगे गए थे।
भारत के अलावा अमेरिका, कनाड़ा, मलेशिया, ईरान, बांग्लादेश, श्रीलंका, यूएई, नेपाल आदि देशों के 750 लोगों ने सर्वेक्षण में सवालों के जवाब दिए। सर्वेक्षण करने वाली टीम का दावा है कि इंडिया में लॉकडाउन के बाद यह सबसे बड़ा सर्वेक्षण है। आइए जानते हैं क्या खास है इसमें-
14 फीसदी ने ही योग से असहमति जताई
योग व्यायाम प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार करने का सबसे बड़ा साधन बनकर उभर रहा है। अनुकूल प्रतिक्रियाओं का सबसे बड़ा प्रतिशत 86 है। केवल 14 फीसदी इसके लिए असहमत थे। विशेषज्ञों ने बताया कि दुनिया में हमारे 5000 पुराने योग को पुनर्जीवित किया गया है। इसमें बाबा रामदेव समेत कई का योगदान रहा है। लोगों ने इम्यूनिटी को बेहतर बनाने के लिए योग में पूरा विश्वास दिखाया है जो आपको कोरोना वायरस से लड़ने में मदद कर सकता है।
सामाजिक दूरी नहीं.. भौतिक दूरी रखी जाए
78 फीसदी सहमत, 22 फीसदी असहमत
बहुत दिलचस्प कारक उभरा कि सामाजिक दूरी के स्थान पर कोरोना वायरस को नियंत्रित करने के लिए भौतिक दूरी होनी चाहिए। इसमें 78% प्रतिभागियों ने सहमति व्यक्त की कि हम भौतिक दूरी बनाए हुए हैं। सामाजिक दूरी की तुलना में भौतिक दूरी अधिक उपयुक्त है। केवल 22% प्रतिभागी भौतिक दूरी का उपयोग करने के लिए असहमत थे। वास्तव में लॉकडाउन के दौरान हम कभी भी सामाजिक कनेक्टिविटी नहीं खोते हैं और फोन, वाट्सएप, ईमेल आदि जैसे विभिन्न माध्यमों के माध्यम से सामाजिक रूप से संपर्क में बने रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ हम शारीरिक कनेक्टिविटी के मामले में पूरी तरह से दूर रहे। यह कोरोना सामाजिक संपर्कों के माध्यम से कभी नहीं फैलता है लोगों के बीच केवल शारीरिक निकटता कोरोना की शुरुआत का एक कारण है।
86 फीसदी लोगों ने कहा- टेली काउंसिलिंग की जरूरत
अगला दिलचस्प सवाल कोरोना वायरस के दौरान लॉकडाउन में टेली-काउंसलिंग की आवश्यकता के बारे में था और 86 फीसदी प्रतिभागियों ने अपनी इच्छा व्यक्त की और केवल 14 फीसदी टेली-मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए असहमत थे। बहुत से लोग चिंतित और तनावग्रस्त हैं। इसलिए लॉकडाउन के दौरान मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर की आवश्यकता महसूस की गई ताकि वे अपने दैनिक जीवन में गड़बड़ी पैदा करने वाले मनोवैज्ञानिक मुद्दों से छुटकारा पा सकें। यह टेली सिस्टम का समय है जिसे या तो स्वास्थ्य या शिक्षा के क्षेत्र में अपनाया जा सकता है ताकि लोगों के साथ जुड़े रहें। यह टेली काउंसलिंग गरीबों के साथ-साथ ग्रामीण आधारित आबादी के लिए भी सुलभ हो सकती है।
सोशल मीडिया पर टाइम पास को लेकर आया दिलचस्प आंकड़ा
78 फीसदी सहमत, 22 फीसदी असहमत
लॉकडाउन में अपना टाइम पास करने के लिए सोशल मीडिया की भूमिका के बारे में सवाल पूछा गया था। इसमें 78 फीसदी लोग सहमत हुए और 22 फीसदी असहमत थे। अधिकांश लोगों का कहना है कि सोशल मीडिया उन्हें अपना समय पास करने में मदद करता है। वास्तव में आज के परिदृश्य में कोई भी अलगाव में नहीं है, क्योंकि हर कोई ईमेल, वाट्सएप, फेस बुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम आदि से बहुत जुड़ा हुआ है। लेकिन 60 फीसदी प्रतिभागियों ने यह भी साझा किया कि मोबाइल संचार भी कोरोना वायरस के बारे में नकारात्मकता को ट्रिगर करता है।
65 फीसदी लोगों ने कहा उनका वजन बढ़ा
सवाल शरीर के वजन पर लॉकडाउन के प्रभाव के बारे में था और 65 फीसदी प्रतिभागियों ने सहमति व्यक्त की कि लॉकडाउन के दौरान उनके शरीर का वजन बढ़ गया है। कुछ ने कम होने की बात भी कही। कहा कि कोई आउटगोइंग नहीं है, पार्क, जिम और आउटडोर गेम पूरी तरह से रुके हुए थे। जबकि 35 फीसदी लोगों ने कहा कि शरीर के वजन के संदर्भ में उनके पास लॉकडाउन का कोई प्रभाव नहीं है।
पारिवारिक स्वास्थ्य के बारे में लगातार असुरक्षा का अनुभव किया गया। क्योंकि 69 फीसदी सहमत थे और केवल 31 फीसदी असहमत थे। लेकिन लोगों ने भगवान में पूर्ण विश्वास दिखाया है और 66 फीसदी ने सहमति व्यक्त की कि वह घर में पूजा-पाठ में काफी समय देते रहे। धार्मिक आस्था इससे प्रभावित नहीं हुई। 34 फीसदी लोगों ने कोरोना के बीच भगवान की पूजा पर विश्वास नहीं किया।
85 फीसदी बुजुर्गों का सता रहा कोरोना का डर
अगला सवाल बुजुर्गों की कोरोना सुरक्षा को लेकर था। 85 फीसदी प्रतिभागियों ने माना की बुजुर्ग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बढ़ती उम्र में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में कोरोना के लिए यह मुफीद होता है। 15 फीसदी लोगों ने इस बात को नहीं माना। कहा कि बुजुर्गों में भी प्रतिरक्षा बेहतर है। क्योंकि तमाम बुजुर्ग लोगों ने कोरोना को मात भी दी है।