थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे बच्चों की जिंदगी आसान नहीं होती। हर कुछ दिन में खून चढ़ाना, लगातार दवाइयां और अस्पताल के चक्कर परिवारों को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ देते हैं।
इनमें सामने आया कि अब पहली बार गर्भवती होने वाली महिलाएं भी जांच को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो रही हैं। पीजीआई में प्राइमिग्रेविडा यानी पहली बार मां बनने वाली महिलाओं के रेफरल 9.6 प्रतिशत से बढ़कर 23.4 प्रतिशत तक पहुंच गए। एम्स और मुंबई के संस्थानों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
विशेषज्ञों ने बताया कि थैलेसीमिया एक आनुवंशिक बीमारी है, जो माता-पिता दोनों के वाहक होने पर बच्चे में आ सकती है। कई बार व्यक्ति बिल्कुल स्वस्थ दिखता है लेकिन उसके जीन में बीमारी मौजूद रहती है। ऐसे में शादी से पहले या गर्भावस्था की शुरुआत में एचबीए 2 और एचपीएलसी जैसी जांच बहुत जरूरी मानी जाती है।
स्टडी में बताया गया कि जिन दंपतियों में दोनों थैलेसीमिया ट्रेट के वाहक होते हैं, उनमें बच्चे को गंभीर बीमारी होने का खतरा करीब 25 प्रतिशत तक रहता है। गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में सी वी एस और एमनियोसेंटेसिस जैसी जांचों से बीमारी की पहचान की जा सकती है। इस स्टडी में पीजीआई की प्रो. रीना दास के साथ ही डॉ. प्रशांत शर्मा, डॉ. जसबीर कौर हीरा, डॉ. संजीव छाबड़ा समेत कई विशेषज्ञ शामिल रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते जांच और जेनेटिक काउंसलिंग को आम लोगों तक पहुंचाया जाए तो आने वाले वर्षों में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों की संख्या काफी कम की जा सकती है।