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विश्व थैलेसीमिया दिवस: मां की कोख में ही थम रही थैलेसीमिया की दस्तक, 10 साल की स्टडी ने जगाई उम्मीद

Fri, 08 May 2026 03:26 PM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

थैलेसीमिया एक आनुवंशिक बीमारी है, जो माता-पिता दोनों के वाहक होने पर बच्चे में आ सकती है। कई बार व्यक्ति बिल्कुल स्वस्थ दिखता है लेकिन उसके जीन में बीमारी मौजूद रहती है।
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थैलेसीमिया - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे बच्चों की जिंदगी आसान नहीं होती। हर कुछ दिन में खून चढ़ाना, लगातार दवाइयां और अस्पताल के चक्कर परिवारों को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ देते हैं। 

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अब गर्भावस्था के दौरान समय पर जांच इस बीमारी को रोकने की बड़ी उम्मीद बनकर सामने आई है। पीजीआई समेत देश के सात बड़े संस्थानों की 10 साल की स्टडी में सामने आया है कि प्रीनेटल जांच से हजारों परिवारों को राहत मिली और लोगों में जागरूकता भी तेजी से बढ़ी है।

इस स्टडी को पीजीआई, एम्स नई दिल्ली, आईसीएमआर-एनआईआईएच मुंबई, एसजीआरएच नई दिल्ली, एसजी पीजीआई लखनऊ, सीएमसी वेल्लोर और हैदराबाद के संस्थान ने मिलकर किया है। इसके अनुसार 2015 से 2024 के बीच 6780 प्रीनेटल डायग्नोसिस किए गए। इन जांचों का उद्देश्य गर्भ में पल रहे बच्चे में थैलेसीमिया और अन्य गंभीर हीमोग्लोबिन बीमारियों का पता लगाना था। पीजीआई में इस दौरान 785 जांचें की गईं। इनमें 214 मामलों में भ्रूण में गंभीर हीमोग्लोबिन विकार पाए गए। 
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विशेषज्ञों के अनुसार यह आंकड़ा बताता है कि समय रहते जांच कितनी जरूरी है क्योंकि थैलेसीमिया पूरी जिंदगी चलने वाली बीमारी है। यह स्टडी इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स में 2026 में प्रकाशित किया गया है जिसमें चिकित्सा संस्थानों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

महिलाओं में बढ़ रही जागरूकता, रेफरल प्रतिशत बढ़कर 23.4%

इनमें सामने आया कि अब पहली बार गर्भवती होने वाली महिलाएं भी जांच को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो रही हैं। पीजीआई में प्राइमिग्रेविडा यानी पहली बार मां बनने वाली महिलाओं के रेफरल 9.6 प्रतिशत से बढ़कर 23.4 प्रतिशत तक पहुंच गए। एम्स और मुंबई के संस्थानों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई।

विशेषज्ञों ने बताया कि थैलेसीमिया एक आनुवंशिक बीमारी है, जो माता-पिता दोनों के वाहक होने पर बच्चे में आ सकती है। कई बार व्यक्ति बिल्कुल स्वस्थ दिखता है लेकिन उसके जीन में बीमारी मौजूद रहती है। ऐसे में शादी से पहले या गर्भावस्था की शुरुआत में एचबीए 2 और एचपीएलसी जैसी जांच बहुत जरूरी मानी जाती है।

समय रहते जांच और काउंसलिंग से थैलेसीमिया पर लग सकती है रोक

स्टडी में बताया गया कि जिन दंपतियों में दोनों थैलेसीमिया ट्रेट के वाहक होते हैं, उनमें बच्चे को गंभीर बीमारी होने का खतरा करीब 25 प्रतिशत तक रहता है। गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में सी वी एस और एमनियोसेंटेसिस जैसी जांचों से बीमारी की पहचान की जा सकती है। इस स्टडी में पीजीआई की प्रो. रीना दास के साथ ही डॉ. प्रशांत शर्मा, डॉ. जसबीर कौर हीरा, डॉ. संजीव छाबड़ा समेत कई विशेषज्ञ शामिल रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते जांच और जेनेटिक काउंसलिंग को आम लोगों तक पहुंचाया जाए तो आने वाले वर्षों में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों की संख्या काफी कम की जा सकती है।

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