चंडीगढ़। अमर उजाला फाउंडेशन के अपराजिता कार्यक्रम के अंतर्गत शुक्रवार को कामकाजी महिलाओं ने मासिक धर्म अवकाश पर आवाज बुलंद की। चर्चा के दौरान महिलाओं ने बताया कि माहवारी के शुरुआती दिन मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होते हैं। ऐसे में एक दिन की पेड लीव मिलना किसी विशेष सुविधा नहीं बल्कि बुनियादी मानवीय आवश्यकता है। महिलाओं ने एकसुर में कहा कि मासिक धर्म अवकाश नीति को कानूनी रूप से देशभर में लागू किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं को सम्मानजनक, सुरक्षित और संवेदनशील कार्य वातावरण मिल सके।
कार्यक्रम में मौजूद विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी महिलाओं ने कहा कि पीरियड्स के दर्द को अक्सर मामूली समझ लिया जाता है। कई महिलाएं क्रैम्प्स, कमजोरी, माइग्रेन, पीठ दर्द जैसी समस्याओं से जूझती हैं। ऐसे में ऑफिस में 8–10 घंटे काम करना उनके लिए भारी पड़ जाता है। चर्चा में यह भी सामने आया कि देश के कई राज्यों में मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था पहले से मौजूद है। कई मल्टीनेशनल कंपनियां भी इसे अपने एचआर पॉलिसी में शामिल कर चुकी हैं। महिलाओं ने सवाल उठाया कि जब नीति का सकारात्मक असर दिख रहा है तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने में देरी क्यों?
महिलाओं ने कहा कि मासिक धर्म अवकाश को लेकर समाज में अब भी झिझक और गलत धारणाएं हैं। अक्सर इसे कार्यक्षमता पर संदेह और सहूलियत का दुरुपयोग कहकर खारिज कर दिया जाता है। महिलाओं ने स्पष्ट कहा कि यह बीमारी नहीं प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है। इसमें राहत की आवश्यकता कोई कमजोरी नहीं बल्कि स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी है। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं कार्यस्थलों में महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य को महत्व देने की सिफारिश कर चुकी हैं। माहवारी स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत करना ही पहला कदम है।
इंटरैक्टिव सत्र में महिलाओं ने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए। किसी ने ऑफिस में बेहोशी तक की बात कही तो किसी ने बताया कि दर्द के बावजूद काम का दबाव झेलना रोजमर्रा की मजबूरी है। कार्यक्रम में अधिवक्ता गीतांजलि वाधवा, ज्योति मेहता, भारती वर्मा, सोनम, संगीता, माया और मित्तुलक्ष्मी ने विचार व्यक्त किए।