हरियाणा में पहला विधानसभा चुनाव सन 1967 में हुआ था। इस चुनाव में 463 पुरुष प्रत्याशी थे। जबकि महिला प्रत्याशियों की संख्या केवल 8 थी। इसी तरह सन 1968 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशियों की संख्या 386 व महिलाओं की संख्या 12, सन 1972 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 371 व महिला प्रत्याशी 13, सन 1977 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 651 और महिला प्रत्याशी 20, सन 1982 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 1068 और महिला प्रत्याशी 27, सन 1987 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 1287 और महिला प्रत्याशी 35, वर्ष 1991 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 1844 व महिला प्रत्याशी 41, सन 1996 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 2515 व महिला प्रत्याशी 93, वर्ष 2000 में पुरुष प्रत्याशी 916 व महिला प्रत्याशी 49, वर्ष 2005 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 923 व महिला प्रत्याशी 60, वर्ष 2009 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 1154 व महिला प्रत्याशी 68 व वर्ष 2014 के चुनाव में पुरुष प्रत्याशी 1235 व महिला प्रत्याशी 116 थे।
सियासी अर्श पर चमकीं ये नेत्रियां
हरियाणा की कुछ नेत्रियां ऐसी भी हैं, जिन्होंने देश ही नहीं विदेश में भी अपनी पहचान बनाई। इसमें बड़ा नाम देश की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का है। इनके अलावा देश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी भी हरियाणा की थीं। इनके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा, पुडुचेरी की उपराज्यपाल चंद्रावती, पूर्व सांसद श्रुति चौधरी, डा. सुधा यादव, कैलाशो सैनी, पूर्व मंत्री किरण चौधरी भी हरियाणा से ही ताल्लुक रखती हैं।
महिलाओं को पावर स्ट्रक्चर से दूर रखना दुर्भाग्यपूर्ण
महिलाओं को पूरा हक देने की आवाजें तो देशभर में बुलंद होती रहती हैं। मगर जब बात ताकत सांझा करने की आती है, तो महिलाओं को हाशिये पर कर दिया जाता है। महिलाओं की योग्यता पर उठने वाले सवालों का जवाब तो महिलाओं की कामयाबी ने खुद ही दे दिया है। सत्ता में जो लोग काबिज हैं, वे इस जवाबदेही से बच नहीं सकते कि किस तरह योजनाबद्ध तरीके से महिलाओं को ‘पावर स्ट्रेक्चर’ से दूर रखा जा रहा है। सत्ता, जहां देश के लिए नीतियां बनती हैं और विकास की दिशा तय होती है, उसमें महिलाओं की पर्याप्त भागेदारी होनी चाहिए। राजनीतिक संगठनों को राजनीति में आगे आने का पूरा मौका महिलाओं को देना चाहिए ।
- जगमती सांगवान, महिला चिंतक, हरियाणा