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समाधान: थर्मल के अपशिष्ट को नष्ट करने की समस्या आई तो प्रोफेसर ने बना डाली राख और प्लास्टिक से ईंट

Mon, 30 Sep 2024 01:48 PM IST
निवेदिता वर्मा प्रियंका ठाकुर, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

पोंड ऐश और सिंगल यूज प्लास्टिक से तैयार ईंट की ताकत सामान्य ईंट से 30 प्रतिशत अधिक है। इसमें पानी अवशोषण रेट 0.01 प्रतिशत है।  
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प्रो. अमित गोयल, मोहित गोदारा और बनाई गई ईंट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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2022 में पंजाब सरकार के सामने जब थर्मल पावर प्लांट के अपशिष्ट को नष्ट करने की समस्या आई तो सरकार ने विज्ञापन जारी कर अपशिष्ट को कंस्ट्रक्शन इस्तेमाल के लिए मुफ्त में देने की बात कही। निट्टर (राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान) के प्रो. अमित गोयल ने राख और प्लास्टिक से ईंटें बनाने की सोची और छात्र मोहित गोदारा के साथ इसे लेकर प्रयोग किए, जिसमें वह कामयाब भी हुए। प्रो. अमित निट्टर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। अमित गोदारा ने सिविल इंजीनियरिंग में मास्टर्स की है।

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बता दें कि कोयला जलाने से दो तरह की राख उत्पन्न होती है, एक फ्लाई ऐश और दूसरी तालाब की राख (पोंड ऐश)। फ्लाई ऐश का प्रयोग सीमेंट बनाने की प्रक्रिया में होता है लेकिन पोंड ऐश की अलग प्रॉपर्टी होने के कारण उसे दोबारा प्रयोग में लाना मुश्किल है। पोंड ऐश हल्की होने के कारण इसे पानी में डूबाकर रखा जाता है। पानी में रखने से बरसात के समय पोंड ऐश जमीन के अंदर रिस्ती है और इसके हानिकारक केमिकल से पानी गंदा हो रहा है।

पोंड ऐश के लिए दिए गए थे विज्ञापन

साल 2022 में पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) को उनके दो थर्मल पावर प्लांट में एकत्र राख को निपटाने में दिक्कत आ रही थी। गुरु नानक देव थर्मल पावर प्लांट में 175 लाख टन फ्लाई, पोंड ऐश और गुरु हरगोबिंद थर्मल पावर प्लांट में 69 लाख टन पोंड ऐश एकत्र थी। अपशिष्ट के प्रयोग को लेकर जारी विज्ञापनों को देखकर प्रो. अमित ने इसे दोबारा प्रयोग में लाने की सोची।

प्रो. अमित ने बताया कि वह प्लास्टिक और पोंड को कंक्रीट में प्रयोग करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वह प्लास्टिक को पोंड ऐश में मिक्स नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि प्लास्टिक को पिघलाने के लिए 200-250 डिग्री का तापमान चाहिए। पिघलाने के बाद वह प्लास्टिक को जैसे ही सामान्य तापमान में पोंड ऐश में मिलाने के लिए डालते तो वह सॉलिड हो जाता। उन्होंने फिर प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े कर उसे पोंड ऐश में मिलाया और अलग-अलग तापमान में उसे गर्म किया। उन्होंने पेट (पॉलीएथीलीन टेराफ्लेट) प्लास्टिक और सिंगल यूज प्लास्टिक दोनों को अलग-अलग मात्रा में पोंड ऐश में मिलाकर गर्म कर उसे ढांचे में डालकर देखा। पोंड ऐश और सिंगल यूज प्लास्टिक को निश्चित मात्रा में मिलाकर उन्हें सबसे बेहतरीन परिणाम मिले।

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प्रो. अमित ने बताया कि वह पोंड ऐश और सिंगल यूज प्लास्टिक से तैयार ईंट व पेवर ब्लॉक का निट्टर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में कर चुके हैं और केमिकल टेस्टिंग अभी चल रही है। उनकी बनाई ईंट की ताकत सामान्य ईंट से 30 प्रतिशत अधिक है। इसमें पानी अवशोषण रेट 0.01 प्रतिशत है। इस आइडिया के लिए 2024 में वह प्रोविजनल पेटेंट के लिए आवेदन कर चुके हैं। केमिकल टेस्टिंग होने के बाद पूरे पेटेंट के लिए आवेदन करेंगे।

क्या है पोंड ऐश और सिंगल यूज प्लास्टिक से बनी ईंट के फायदे 

पोंड ऐश और सिंगल यूज प्लास्टिक दोनों ऐसी चीजें हैं, जो पर्यावरण में प्रयोग न होकर प्रदूषण फैला रही है। ऐसे में इससे ईंट, पेवर ब्लॉक की तरह प्रयोग करने में पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचेगा। साथ ही इसे बनाने की कीमत सामान्य ईंट से कई गुना कम है, क्योंकि सामग्री लागत शून्य है। सीमेंट को पूरा तैयार होने में 28 दिन लगते हैं लेकिन इसकी सामग्री तैयार कर इसे तुरंत बनाया जा सकता है। प्रो. अमित और मोहित ने पोंड ऐश और सिंगल यूज प्लास्टिक से ईंट व पेवर ब्लॉक बनाने के लिए पोर्टेबल मशीन विकसित कर रहे हैं, जिसमें दोनों का मिश्रण डालकर ईंट या पेवर ब्लॉक बनाए जा सकते हैं। यह प्रयोग और इसपर हुआ काम मोहित गोदारा का मास्टर्स का प्रोजेक्ट है, जिस पर वह रिसर्च पेपर लिख रहे हैं।

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