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देखिए 5 सदस्यों का एक परिवार, 4 आंखों से देख नहीं सकते और एक टांगों से चल नहीं सकता

Mon, 10 Sep 2018 03:36 PM IST
जतिंदर देवगन, अमर उजाला, बरनाला(पंजाब)
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अजब-गजब परिवार
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5 सदस्यों वाले एक परिवार की कहानी पढ़ेंगे तो आपका दिल भर आएगा, चार लोग आंखों से देख नहीं सकते और एक शख्स टांगों से चल नहीं सकता। जैसे-तैसे गुजारा चलता है, ज्यादातर वक्त दूसरों के रहमो करम पर जी रहे हैं। कमाएं कैसे, दिखता नहीं, चल नहीं सकते। लोग मजबूरी का फायदा उठाते। उठाकर ले जाते, काम कराते और छोड़ जाते। कभी मजदूरी दे देते, तो कभी नहीं। जब नहीं मिलती तो गांव वाले रोटी दे जाते। शायद मजबूरी इसी को कहते हैं कि जिंदगी मिली है, पर उसे जी नहीं सकते।
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ये दर्दनाक कहानी है पंजाब में बरनाला जिले के गांव मूंम निवासी गुरंजट सिंह और उसके परिवार की। गुरजंट सिंह दोनों टांगों से चलने में लाचार है। पत्नी व तीनों बच्चों की आंखों में रोशनी नहीं है, तो वे कोई काम नहीं कर सकते। गुरजंट सिंह को केवल 700 रुपये पेंशन मिलती है, इसके अलावा वह जो मजदूरी से कमाकर लाता है उसी से घर का खर्च चलता है।

गुरजंट सिंह की पत्नी गुरमीत कौर ने बताया कि उसे बचपन से ही दिखाई नहीं देता। उनके तीन बच्चों 18 वर्षीय सतनाम सिंह, 13 वर्षीय अमनदीप कौर और 4 साल की बेटी जसवीर कौर की आंखों से भी कम दिखाई देता है। गुरजंट का कहना है कि मेरी तो उम्र हो गई है बस यही प्रार्थना है कि उनके बच्चों की आंखों का इलाज हो जाए तो इनकी जिंदगी में खुशियों का उजाला भर जाए। घर से बाहर जाने लायक भी नहीं हैं।
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पीजीआई में हो सकता है इलाज

pgi chandigarh
डाक्टरों ने बड़े लड़के सतनाम सिंह की आंखों का चेकअप करके लैंस तक डाले थे, लेकिन उसको फिर भी दिखाई नहीं दिया। उनको डाक्टरों ने पीजीआई जाने के लिए कहा है, लेकिन परिवार के एकमात्र कमाने वाले गुरजंट के पास पीजीआई, चंडीगढ़ जाने का पैसा तक नहीं है

एक्सीडेंट में गंवाईं टांगें
गुरजंट की पत्नी का कहना है कि एक वर्ष पहले उसके पति की एक्सीडेंट के दौरान टांगें खराब हो गई थीं। लोग उसके पति को अपने वाहन पर ले जाते हैं, उसको बैठकर ईंटें तोड़कर रोड़ी बनाने जैसा काम दिया जाता है। काम करवाकर वे उसे वापस छोड़ जाते हैं। कई बार तो मजदूरी न मिलने पर गांव वाले उनको रोटी दे जाते हैं। बस लोगों की रहमत व भगवान के आसरे उनके दिन कट रहे हैं।

रिश्तेदारी में भी उनकी सहायता करने वाला कोई नहीं है। गुरजंट को केवल 700 रुपये पेंशन मिलती है, जबकि पूरे परिवार की पेंशन लगनी चाहिए या आंखों का इलाज हो जाए तो मेहनत मजदूरी करके गुजर बसर कर लेंगे। छोटी बेटी को पढ़ा लिखा भी सकते हैं। बाकी की तो पढ़ाई की उम्र निकल गई।

क्या कहना है डीसी का
जब इस सबंध में जिले के डीसी धर्मपाल गुप्ता से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि आपके द्वारा पता चला है कि जिले के गांव मूंम में ऐसा परिवार भी रहता है। वह सारी वेरिफिकेशन करवाकर इस परिवार को ज्यादा से ज्यादा माली सहायता दिलवाने की कोशिश करेंगे।

 
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