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कोरोना काल में प्रदूषण बढ़ा तो श्वास रोगियों को होगी दिक्कत, वैज्ञानिक बोले- न जलाएं अवशेष

Mon, 14 Sep 2020 04:19 PM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला, करनाल
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वेबिनार में शामिल विशेषज्ञ - फोटो : अमर उजाला
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अमर उजाला संवाद कार्यक्रम के तहत रविवार को ‘फसल अवशेष की रक्षा, पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति और भूमि स्वास्थ्य की सुरक्षा’ विषय पर वेबिनार में अनुसंधान वैज्ञानिकों ने किसानों को जागरूकता का संदेश दिया। उनका कहना है कि चूंकि, धान कटाई का काम शुरू हो चुका है, अब चिंता है कि कोरोना काल में यदि प्रदूषण का स्तर बढ़ा तो श्वांस के मरीजों की परेशानी बढ़ेगी। इसलिए खेत की पराली खेत में रखें। इसके लिए समाज का हर वर्ग मिलकर जागरूकता मुहिम से जुड़े। अवशेष प्रबंधन के लिए तकनीक व मशीनरी उपलब्ध है। क्योंकि इस बार अवशेष जलाने की प्रक्रिया शून्य करनी है।
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सभी जुड़ें जागरूकता मुहिम से
बहुत से किसान अवशेष प्रबंधन तकनीक से खुश हैं। ंइसके लिए अब सामाजिक जागरूकता आंदोलन की जरूरत है। जिसमें सभी मिलकर जागरूकता लाएं। आध्यात्मिक दृष्टि से सोचें कि धरती हमारी मां है। मां के सीने पर अवशेष में आग लगाकर बेटा घर कैसे जा सकता है। एक चुटकी भर मिट्टी में करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु होते हैं। आग से उनको क्षति होती है।
- डॉ. समर सिंह, वाइस चांसलर, महाराणा प्रताप बागवानी, विश्वविद्यालय

वेस्ट डी-कंपोजर से खेत में गलाएं अवशेष

वेस्ट डी-कंपोजर से अवशेषों को खेत में गलाएं। इस प्रक्रिया के लिए 25 से 30 दिन का समय चाहिये। जिससे 70 से 80 प्रतिशत तक अवशेष गल जाते हैं। 200 लीटर के ड्रम में दो किलो गुड़ व डी कंपोजर की शीशी घोल दें। चार दिन में यह घोल तैयार हो जाएगा। यह घोल 500 लीटर प्रति एकड़ में छोड़ना चाहिये।  इससे खेत में कार्बन की मात्रा बढ़ेगी।
- डॉ. एसपी तोमर, वाइस चेयरमैन, एचएफपीसी, फार्मर्स प्रोड्यूर्स आर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया

250 कस्टम हायरिंग सेंटर पर उपलब्ध कृषि यंत्र
जिले में 250 कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए हैं। जिन पर वह तमाम आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध हैं जिनसे अवशेष प्रबंधन किया जाता है। अब तक जिले में 24 करोड़ रुपये यंत्रों पर अनुदान स्वरूप दिया जा चुका है।  पराली जलाने वालों की सेटेलाइट से मिलने वाली लोकेशन को ट्रेस कर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जुर्माना लगाएगा।
- सहायक कृषि अभियंता, डा. जगदीश मलिक, कृषि विभाग हरियाणा
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आम के आम, गुठलियों के दाम

15 नवंबर तक धान की कटाई होती है। प्रति हेक्टेयर करीब आठ टन पराली होती है। किसान के पास उसे सड़ाने का समय नहीं होता और वह आसान तरीका ढूंढता है। यही वजह है कि पंजाब व हरियाणा में जमीन में मुख्य पोषक तत्वों की भारी कमी आई। उनकी सलाह है कि कंबाइन पर सुपर स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम अनिवार्य हो। गेहूं बिजाई करते समय लाइन के बीच पराली छोड़ती है।  खेत में नमी बनी रहेगी। पौधे को पोषक तत्व मिलेंगे।
- डॉ. एसके ककरालिया, अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान वैज्ञानिक

अगली फसल का खाद हैं अवशेष
अवशेष केवल अवशेष नहीं बल्कि वह अगली फसल के लिए खाद हैं। किसानों को यह बात समझनी होगी। अवशेषों को जल्द डी-कंपोज करने पर उनका तर्क है कि इसके बजाय अहिस्ता-अहिस्ता अवशेष कंपोज हों। जितना धीरे-धीरे कंपोज होंगे उतना ही अगली फसल को फायदा होता रहेगा। यह अगली फसल को धीरे-धीरे मिलने वाली खाद का काम करेंगे।
- डॉ. लव कुमार सिंह, वैज्ञानिक, बोरलॉग इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशिया, लुधियाना

श्वास संबंधी मरीजों की बढ़ सकती दिक्कत
किसानों को प्रशिक्षण व जागरूकता जरूरी है। उन पर कोई तकनीक थोपनी नहीं चाहिये। हर तकनीक का अपना डोमेन होता है। सुपर सीडर मशीन के बारे में यह ज्यादा रिसर्च नहीं है कि इसका जमीन की संरचना, किसान की इकॉनामी पर क्या प्रभाव रहेगा। इस पर कितना ईंधन खपत होगा। कोरोना का प्रसार चल रहा है। ऐसे में यदि प्रदूषण भी जुड़ गया तो सांस संबंधित मरीजों के लिए दिक्कत होगी।   
- डॉ. दीपक, अनुसंधान वैज्ञानिक, अंतर्राष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र
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