पांच दिनों के दौरान फ्रांसीसी टीम व्यक्तिगत रूप से विरासत वस्तुओं की पहचान करने के लिए विभिन्न स्थलों का दौरा करेगी और विभिन्न विभागों, संस्थानों और कार्यालयों की ओर से नियुक्त नोडल अधिकारियों के साथ बैठक करेगी। इसके बाद हेरिटेज आइटम्स की सूची को भी प्रशासन अपग्रेड करेगा। इसमें कई नए आइटम्स को शामिल किया जाएगा।
पेटेंट कराने का यह होगा लाभ
पेटेंट हो जाने से हेरिटेज फर्नीचर के जैसे दिखने वाले फर्नीचर कोई नहीं बना सकेगा। न ही उसकी तस्करी कर सकेगा। अगर कोई फर्नीचर बनाना चाहेगा तो उसे रॉयल्टी चुकानी होगी। हेरिटेज वस्तुओं की पहचान कर उनकी नंबरिंग की जाएगी और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी होगी। सभी की जानकारी डिजिटल माध्यम से सुरक्षित रखी जाएगी ताकि भविष्य में हेरिटेज फर्नीचर की तस्करी पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके।
बता दें कि शहर का हेरिटेज फर्नीचर पिछले कई साल से विदेश में लाखों में नीलाम हो रहा है। यह सभी फर्नीचर चंडीगढ़ के पंजाब यूनिवर्सिटी, यूटी सचिवालय, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट, विभिन्न स्कूल व कॉलेज का है। इनके चाहने वाले इसे मुंहमांगी कीमत पर खरीदते हैं। दाम कई गुना ज्यादा होने की वजह से इसकी तस्करी भी बढ़ गई है।
हेरिटेज आइटम्स की पहचान कर रही है एचआईआईआईसी
प्रशासन को यह भी नहीं पता था कि चंडीगढ़ में कितने हेरिटेज आइटम हैं। वर्ष 2016 में चंडीगढ़ के हेरिटेज फर्नीचर आइटमों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए विरासत आइटम पहचान और निरीक्षण समिति (एचआईआईआईसी) का गठन किया गया था। इसके बाद 2019 और 2020 में चंडीगढ़ के एक सीनियर आर्किटेक्ट की अध्यक्षता में एचआईआईआईसी का गठन हुआ। एचआईआईआईसी ने अब तक विभिन्न विभागों, संस्थानों, कार्यालयों में उपलब्ध विरासत वस्तुओं की सूची करण और निरीक्षण किया है।