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स्मृति शेष: प्रसिद्ध साहित्यकार व समालोचक प्रो. रमेश कुंतल मेघ का निधन, मानवता के लिए छोड़ गए देह

Sun, 03 Sep 2023 11:27 AM IST
निवेदिता वर्मा संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़

सार

प्रो. रमेश कुंतल मेघ  ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज से भौतिक विज्ञान, गणित और रसायन शास्त्र में बीएससी करने के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी से साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। वह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे।
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प्रोफेसर रमेश कुंतल मेघ - फोटो : फाइल
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विस्तार
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हिंदी के वयोवृद्ध साहित्यकार और सौंदर्यशास्त्री प्रोफेसर रमेश कुंतल मेघ का शुक्रवार को निधन हो गया। 94 वर्षीय प्रो. मेघ अब चंडीगढ़ सेक्टर-16 स्थित अपनी पुत्री शिप्राली के घर रह रहे थे। यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली। वह पहले पंचकूला में रहते थे। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है।
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प्रो. रमेश कुंतल मेघ के निधन पर शहर के साहित्यकारों ने गहरा दुख प्रकट कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। प्रो. मेघ देहभाषा के भी साहित्यकार की इच्छानुसार, परिजनों ने उनका पार्थिव शरीर पीजीआई को दान कर दिया। इसके चलते उनका अंतिम संस्कार नहीं होगा। जीवन भर साहित्य की सेवा करने वाले प्रो. मेघ मृत्यु के पश्चात समाज को सांसारिक नश्वरता का संदेश दे गए।

प्रो. कुंतल मेघ की पुत्री शिप्राली के मुताबिक, उनके पिता काफी समय से उनके पास रह रहे थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज से भौतिक विज्ञान, गणित और रसायन शास्त्र में बीएससी करने के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी से साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। वह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे। प्रो. मेघ ने बिहार विश्वविद्यालय (आरा), पंजाब विश्वविद्यालय (चंडीगढ़), गुरुनानकदेव विश्वविद्यालय (अमृतसर), यूनिवर्सिटी ऑफ आरकंसास पाइनब्लक (अमेरिका) में अध्यापन कार्य किया। गुरुनानकदेव विश्वविद्यालय, अमृतसर में वह हिंदी विभाग में बतौर प्रोफेसर और अध्यक्ष अपनी सेवाएं दीं थीं। उनका नाम हिंदी समालोचना के क्षेत्र में सम्मान से लिया जाता रहा है। प्रो. मेघ जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने पंचकूला में अपना घर बनाया था।
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हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी ने उन्हें वर्ष 2014 का पंडित माधव प्रसाद मिश्र सम्मान प्रदान किया था। वह उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण और डॉ. लोहिया साहित्य सम्मान से भी पुरस्कृत थे। वर्ष 2017 में उनकी पुस्तक विश्व मिथक सरितसागर के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया था। ‘विश्व मिथक सरित्सागर’ नामक प्रथम हंसगान के सहवर्तन में ‘मानवदेह और हमारी देहभाषाएं’ नामक दूसरा ग्रन्थ वर्ष 2015 में प्रकाशित हुआ था। इसके अलावा उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार प्राप्त किए।
इनसेट

शहर के साहित्यकारों ने जताया शोक
संवाद साहित्य मंच, चंडीगढ़ ने वरिष्ठ साहित्यकार, आलोचक, कवि और सौंदर्यशास्त्री प्रोफेसर रमेश कुंतल मेघ के निधन पर शोक व्यक्त किया। मंच के अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम विज ने कहा कि वह आखिरी समय तक सक्रिय रहे। कुछ समय पूर्व मैंने उन्हें अपनी पुस्तक भेंट की थी। इस अवसर पर डॉ. विनोद शर्मा, नीरू मित्तल नीर, केके शारदा, सुभाष भास्कर, डॉ. अनीश गर्ग आदि उपस्थित थे। उनकी याद में 2 मिनट का मौन रखा गया।

विज्ञान के विद्यार्थी को हिंदी से हुआ प्यार
प्रो. मेघ विज्ञान के विद्यार्थी थे। बीएससी के बाद वह हिंदी की ओर बढ़े और बढ़ते चले गए। हिंदी साहित्य में उनका बेहतरीन योगदान है। अलग-अलग देशों के विश्वविद्यालयों में उन्होंने हिंदी पढ़ाई। वह खुले मन से सभी से बात करते थे। वह हमेशा याद किए जाएंगे। - डॉ. शशि प्रभा, साहित्यकार

मेघ ने कालजयी कृतियां साहित्य को सौंपीं

साहित्य के गंभीर अध्येता प्रो. रमेश कुंतल मेघ आलोचनात्मक ग्रंथों के साथ अपनी कालजयी कृतियां साहित्य को सौंपीं हैं। जीवन के 94 वर्ष पूर्ण कर एक सितंबर को परम सत्ता में विलीन हो गए। उन्होंने अपने मूल्यों व शर्तों पर जीवन जिया। वह ज्ञान का पुंज थे। आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें याद करेंगी। सदी के महान साहित्यकार को विनम्र श्रद्धांजलि। -डॉ. दलजीत कौर, साहित्यकार

विश्वकोषीय ज्ञान के धनी थे प्रो. मेघ

प्रो. रमेश कुंतल में विश्वकोषीय ज्ञान के धनी थे। साहित्य मनीषी प्रगतिवादी विचारधारा के पोशाक, सदैव उत्साहित करने वाले थे। मेरी पत्नी डॉक्टर नीलम गोयल ने उनके संरक्षक में वर्ष 1980 में पीएचडी पूरी की। उनसे पहली मुलाकात डीएवी कॉलेज में हुई थी। साहित्य के मनीषी थे। प्रगति वादी विचारधारा के पोषक, सदैव उत्साहित करने वाले थे। उन्होंने प्रसिद्ध साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के मार्गदर्शन में पीएचडी की और उनका वाइवा डॉ. राहुल सांकृत्यायन ने लिया था। -जंग बहादुर गोयल, लेखक
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