जो डर गया वो मर गया... बचपन से यह डायलॉग सुनते आ रहे थे। अचानक जब हम दोनों भाई कोरोना की चपेट में आए तो ऐसा लगा जैसे यह बातें सच न हो जाए। इसलिए हमने सबसे पहले अपने अंदर के डर को मारा। उसका ही नतीजा है, जो हमने कोरोना पर जीत दर्ज की और फिर से पहले की तरह खुशहाल जीवन में लौटकर वापस आ पाए। यह कहना है बापूधाम निवासी 22 साल के संतोष और उसके छोटे 15 साल के भाई सतिंदर सिंह राणा का। ये दोनों भाई कोरोना पॉजिटिव होकर लगभग एक महीने तक अपने माता-पिता और बहन से दूर रहे। इस दौरान इन्हें एक बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी कि मुश्किल घड़ी में हिम्मत हारने से नहीं, एक-दूसरे की ताकत बनने से जीत मिलती है।
कभी सोचा नहीं था ऐसा होगा हमारे साथ
संतोष ने बताया कि जिंदगी में सब कुछ सामान्य चल रहा था। अचानक 29 अप्रैल को मुझे और मेरे छोटे भाई सतिंदर सिंह राणा में कोरोना की पुष्टि हुई। यह सुनकर उनके माता-पिता और बहन तनाव में आ गए। संतोष ने बताया कि घर का बड़ा बेटा होने के नाते मुझ पर सबकी जिम्मेदारियां थीं। ऐसी स्थिति में कोरोना जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में आने के बाद मुझ पर तनाव का हावी होना लाजिमी था, लेकिन अब कुछ भी नहीं किया जा सकता था। मुझे और मेरे भाई को पीजीआई में भर्ती किया गया। 20 मई तक हम दोनों पीजीआई में रहे। उसके बाद 7 दिनों तक सूद धर्मशाला में रखा गया। 27 मई को हम दोनों घर लौटे।
मैं डर गया तब छोटे भाई ने दी हिम्मत
पीजीआई में भर्ती रहने के दौरान वहां के डॉक्टरों और स्टाफ ने काफी हद तक सपोर्ट किया। संतोष ने बताया कि वहां के स्टाफ ने दोनों भाइयों को काफी मोटिवेट किया। सतिंदर जहां एडवेंचर और रोचक चीजों में रुचि रखता है, वही संतोष को ट्रैवलिंग और सोशल वर्क करने में आनंद आता है। संतोष ने बताया कि कोरोना के डर के कारण वह कई बार पीजीआई में बेहद तनाव में चले जाते थे। उस दौरान सतिंदर हिम्मत बढ़ाता था। उन्हें रोचक किस्से और कहानियों में हीरो की जीत की दास्तां सुनाकर हिम्मत देने का प्रयास करता था। संतोष का कहना है कि छोटे भाई से मिली हिम्मत से कोरोना पर जीत दर्ज करने में सफल रहे।