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भाजपा के दो पार्षदों ने किया ‘खेल’

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चंडीगढ़। भाजपा बगावत के सिलसिले को तोड़ने में इस बार भी नाकाम रही। भाजपा के दो पार्षदों ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए भाजपा व कांग्रेस के दोनों मेयर उम्मीदवारों के नाम पर मुहर लगा दी। इस कारण भाजपा के दो वोट खारिज हो गए। ऐसे में मेयर पद के लिए भाजपा को 19 में से 17 ही वोट मिल सके। वहीं सीनियर डिप्टी मेयर व डिप्टी मेयर पद पर भाजपा उम्मीदवारों को पूरे 19 मत मिले। हालांकि भाजपा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम ने कमेटी बनाकर इस मामले की जांच के निर्देश दे दिए हैं। दोनों पार्षदों को चिह्नित कर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
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मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर व डिप्टी मेयर पद के लिए भाजपा में जैसे ही उम्मीदवार की घोषणा हुई वैसे ही बगावत शुरू हो गई थी। पार्षद चंद्रावती शुक्ला ने मेयर पद के लिए निर्दलीय प्रत्याशी का फार्म भी भर दिया, जबकि भरत कुमार ने पार्टी छोड़ने का एलान कर दिया था। उसके बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने दावा किया था कि सभी पार्षदों को मना लिया गया है। बदले घटनाक्रम में लगातार क्रॉस वोटिंग के कयास लगाए जा रहे थे। शुक्रवार को यही हुआ मेयर पद पर भाजपा के 19 में से 17 ही वोट पड़े। दो वोट जानबूझकर खराब किए गए। पुराना संकट फिर उठता देख प्रदेश प्रभारी ने तत्काल प्रदेश अध्यक्ष को कमेटी बनाकर जांच के निर्देश दे दिए हैं।
चार साल पार्षद के, पांचवां हमारा : दुष्यंत कुमार गौतम
भाजपा प्रदेश प्रभारी ने कहा कि एक बार पार्षद चुने जाने के बाद पांच साल पार्टी उस पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है, लेकिन पार्षद याद रखें, चार उनके हैं तो पांचवां साल हमारा है। इस बार पांचों साल का आकलन किया जाएगा। दो वोट खराब होना चिंता का विषय है। इसे गंभीरता से लिया जाएगा। पार्टी हाईकमान के सामने पूरी रिपोर्ट रखी जाएगी और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
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केंद्र के साथ बैठक कर निकालेंगे वित्तीय समस्या का समाधान
निगम में वित्तीय समस्या को लेकर भाजपा प्रदेश प्रभारी ने कहा कि वित्त की समस्या हर जगह है। सांसद व मेयर के साथ केंद्र में एक बार बात की जाएगी ताकि इस समस्या का कोई स्थायी हल निकल सके। चंडीगढ़ में मेयर कार्यकाल को पांच साल का करने को लेकर प्रदेश प्रभारी ने कहा कि प्रत्येक जगह के हिसाब से यह व्यवस्था की गई है इसलिए इसमें टिप्पणी करना ठीक नहीं है।
जनता के हित के लिए अपनों से भी टकराएंगे
हाउसिंग बोर्ड के सामने भाजपा के धरने को लेकर प्रदेश प्रभारी ने कहा कि जनता के हित की बात आएगी तो अपने लोगों से भी टकराने में कोई हर्ज नहीं। भाजपा पूरे साल चुनाव के मूड में रहती है। चुनावी साल देखकर कोई रणनीति देखकर योजना नहीं बनाती। कांग्रेस की तरह भाजपा ने धोखा देना नहीं सीखा है। जो भी करते हैं जनता के हित में फैसले करते हैं।
पहले भी बन चुकी है कमेटी, परिणाम कुछ नहीं निकला
वर्ष 2019 में पार्टी ने राजेश कालिया को उम्मीदवार बनाया तो सतीश कैंथ ने बगावत करते हुए निर्दलीय तौर पर कांग्रेस के समर्थन से महापौर का चुनाव लड़ा। बेशक वह चुनाव हार गए लेकिन वह भाजपा के आठ पार्षदों के वोट क्रॉस करवाने में कामयाब रहे। तब भी भाजपा की काफी किरकिरी हुई। इसके बाद जांच भी कराई गई, लेकिन परिणाम कोई नहीं निकला। इसके अलावा पिछले साल भाजपा पार्षद चंद्रावती शुक्ला ने बगावत कर महापौर पद के लिए आवेदन करने की तैयारी कर ली थी।
वहीं, वर्ष 2018 में पार्टी ने पूर्व सांसद सत्यपाल जैन गुट के देवेश मौदगिल को महापौर पद का उम्मीदवार बना दिया। उस समय भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन गुट की आशा जसवाल ने बगावत करते हुए अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ नामांकन भर दिया। 2017 में नगर निगम में वित्त एवं अनुबंध कमेटी के पांच सदस्यों के लिए चुनाव हुआ जिसमें एक सीट पर सांसद किरण खेर गुट की पार्षद हीरा नेगी को खड़ा किया लेकिन गुटबाजी के कारण हीरा नेगी चुनाव हार गईं जबकि भाजपा के पास नेगी को जीत दिलवाने का पूर्ण बहुमत था। वर्ष 2015 में सांसद किरण खेर के दबाव के कारण पार्टी ने हीरा नेगी को मेयर पद का उम्मीदवार बनाया, जबकि टंडन गुट आशा जसवाल को महापौर बनवाना चाहता था, लेकिन टंडन गुट की उम्मीदवार तय करते नहीं चली। इसके बाद वह चुनाव हार गईं। 1998 में भाजपा ने अपनी ही पार्टी द्वारा तय उम्मीदवार को हरवाकर बागी उम्मीदवार केवल कृष्ण आदिवाल को मेयर का चुनाव जितवा दिया था। अब कमेटी की रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई होगी, यह देखना रोचक रहेगा।
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