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थर्ड जेंडर की मान्यता, फिर भी अब तक नहीं मिली ट्रांसजेंडरों को आजादी

Fri, 15 Apr 2016 10:47 AM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
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ट्रांसजेंडर - फोटो : demo pics
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ठीक दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडरों को तीसरे लिंग के तौर पर मान्यता दी थी। उस समय माना जा रहा था कि शीर्ष अदालत के फैसले से इस विशेष वर्ग की जिंदगी में काफी अहम बदलाव आएगा। स्कूलों में शिक्षा मिलेगी। पेट भरने के लिए रोजगार मिलेगा।
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बुजुर्ग ट्रांसजेंडरों को पेंशन मिलेगी। लेकिन इनमें से एक भी सुविधाएं न तो कागजों में आईं और न ही जमीन पर। हालांकि कुछ जगहों पर तीसरे जेंडर का विकल्प मिलने लगा है। जैसे कि निर्वाचन आयोग, पंजाब यूनिवर्सिटी, पीजीआई, जीएमसीएच 32 व एलआईसी। लेकिन इस वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोग मानते हैं कि ये कदम न के बराबर हैं। 

शिक्षा व रोजगार नहीं होने से  ट्रांसजेंडरों के पास आय का कोई साधन नहीं है। कुछ प्रदेशों में ट्रासजेंडर वेलफेयर बोर्ड  हैं, लेकिन उत्तर भारत में इनकी स्थापना भी नहीं की गई है। ट्रांसजेंडर में जो किन्नर संस्कृति में चले गए उनके लिए फिलहाल ज्यादा मुश्किलें नहीं हैं। लेकिन जो इस रास्ते पर नहीं जाते, उनके लिए परेशानी बढ़ जाती है।
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नतीजतन वे ट्रेन में या फिर बस अड्डे पर रुपये मांगते हैं या फिर सेक्स वर्कर बन जाते हैं। ऐसे बहुत कम लोग हैं, जो मेहनत का रास्ता चुनते हैं। ज्यादातर ट्रांसजेंडर मानते हैं कि यदि उन्हें शिक्षा मिलती और सोसाइटी उन्हें स्वीकार करती तो वे भी नार्मल लोगों की तरह जिंदगी बिता रहे होते। चंडीगढ़ में रह रहे चार अलग-अलग ट्रांसजेंडरों से समझेंगे कि आखिर वे अपना जीवन कैसे और किन हालात में गुजार रहे हैं।

1. बधाई देने वाले किन्नर 
ट्रांसजेंडरों की एक संस्कृति है, जिसे किन्नर कहते हैं। शादी या बच्चे के जन्म पर किन्नर लोगों के घर जाकर  बधाई देते हैं और बदले में शगुन लेते हैं। इनकी अपनी गद्दी होती है, जो उन्हें उनके बुजुर्गों से मिलती है। सेक्टर 38 के पास रहने वाले किन्नरों ने अपना नाम न छापने के शर्त पर हमसे कई बातें शेयर कीं। उन्होंने बताया कि किन्नरों के नियम काफी कठिन होते हैं। जैसे कि समय पर पूजा करना, मंदिर जाना, एक ही जगह रहना। बाहर निकलना है तो सिर्फ काम के लिए।

बधाई देने जाना होगा। आस-पास के लोगों से कोई संपर्कनहीं रखना होगा। जो इन नियमों का पालन नहीं कर पाते, वे यहां पर नहीं रह पाते और जीवन जीने के लिए दूसरे साधन अपनाते हैं। उसके बाद हमारा उनसे नाता नहीं रहता। उन्होंने कहा कि आजकल कई खबरें आती हैं कि जानबूझ कर किन्नर बनाया जाता है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं होता। ऐसी बाते वहीं करते हैं, जिन्हें ट्रांसजेंडर के बारे में पता नहीं है।

सिर्फ मकान की दिक्कते आती हैं
किन्नरों का कहना है कि उन्हें सबसे ज्यादा दिक्कत मकान की आती है। कोई भी उनको किराए पर मकान नहीं देता। मकान मिलता है तो स्लम एरिया या कालोनी में। सरकार की ओर से इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता। कुछ ट्रांसजेंडर पिछले कई सालों से सरकार से मकान की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई काम नहीं हो पाया है। हाउसिंग बोर्ड को उनके लिए भी मकान की व्यवस्था करनी चाहिए। एक किन्नर ने बताया कि उसने 12वीं तक पढ़ाई की है, लेकिन वह खुद ही आगे नहीं पढ़े। लेकिन वे मानते हैं कि किन्नरों की पढ़ाई के लिए अलग से व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि जो पढ़ना चाहें तो पढ़ सकें।

पुलिस मारती है, तंग करती है और सेक्स भी करती है

ट्रांसजेंडर - फोटो : demo pics
2.सेक्स वर्कर के तौर पर काम करने वाले
कजहेड़ी में रहने वाले पंकज भी ट्रांसजेंडर हैं। वे पिछले छह सालों से सेक्स वर्कर हैं। पहले वे एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करते थे, लेकिन बाद में उनको नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद में उन्हें सेक्स वर्कर बनना पड़ा। उनके साथ दूसरे ट्रांसजेंडर भी यही काम करते हैं।

मूल रूप से उत्तराखंड के रहने वाले पंकज बताते हैं कि एक ट्रांसजेंडर के तौर पर अब तक बिताए गए जीवन में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। 12वीं तक पढ़े पंकज पहले मोहाली की एक कंपनी में काम करते थे। दो साल तक वे अपने एक मित्र के साथ ही रहते थे, लेकिन जब उनके मित्र का ट्रांसफर हो गया तो उनका अकेले रह पाना मुश्किल था। लोग उन्हें तंग करते थे। अश्लील कमेंट झेलने पड़ते थे। इसके चलते उन्होंने अपनी जॉब छोड़ दी।

एड्स से जुड़ी एनजीओ में काम किया, रुपये तक नहीं दिए
पंकज ने बताया कि गोदरेज से निकलने के बाद उन्होंने  एड्स से जुड़ी एक संस्था के साथ काम किया। लेकिन उन्हें तनख्वाह नहीं दी गई। इसके चलते उनको सेक्स वर्कर के तौर पर काम करना पड़ा। वे कहते हैं यदि पुलिस उन्हें तंग न करे तो इस काम में कोई परेशानी नहीं आती। कई ऐसे लोग हैं, जो दिन में बहुत साफ-पाक हैं, लेकिन रात में वे हमारे ग्राहक हैं।

उनका कहना है कि भले ही वे सेक्स वर्कर बन गए हैं, लेकिन उनकी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। जब रात के वक्त अपने धंधे पर निकलते हैं तो कई पुलिस वाले उन्हें हवालात में डालने का डर दिखाकर धमकाते हैं। डर दिखाकर वे उनके साथ (एनल) सेक्स करते हैं। उसके बदले रुपये देने में आनाकानी करते हैं।

घर से बाहर निकलना मुश्किल
पंकज ने बताया कि वे पूरे दिन एक कमरे में ही रहते हैं। बाजार मात्र 100 मीटर की दूरी पर है, लेकिन वहां नहीं जा पाते। कभी खुलकर घूम नहीं पाते। जैसे ही घर से बाहर निकलते हैं तो लोग उन पर कमेंट करते हैं। घूर-घूर कर देखते हैं। अश्लील हरकते करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे माहौल में हम लोग कैसे बाहर निकल पाएंगे। न ही हमारा कोई घर-बार है और न ही परिवार । ऐसे में लगता है कि जो हम काम कर रहे हैं, वही सबसे ठीक है।
 

ट्रांसजेंडरों को अधिकार दिलाने के लिए काम कर रहे हैं

ट्रांसजेंडर - फोटो : demo pics
3.फेमिली के साथ रहते हैं, पत्नी भी है और बच्चे भी
ट्रांसजेंडरों की खोज में हमें एक ऐसा ट्रांसजेंडर मिला जिसकी एक फेमिली भी है। नयागांव में रहने वाले धनंजय चौहान अपने पेरेंट्स के साथ रहते हैं। वे एक ट्रांसवुमन हैं। मतलब शरीर पुरुषों का है, लेकिन उनकी भावनाएं महिला की हैं। उनकी पत्नी और दो बच्चे हैं। धनंजय ने बताया कि जब वे 20 साल के साथ थे, तब उन्हें पता चला कि वे ट्रांसजेंडर हैं।

हालांकि बचपन में ही उन्हें फ्रीमेल चीजों के प्रति आकर्षण बढ़ गया था, लेकिन जब उन्हें पता चला तो वे डिप्रेशन में आ गए। कई बार उन्होंने सुसाइड करने की सोची। वे शादी नहीं करना चाहते थे, लेकिन पेरेंट्स के दबाव के सामने उन्हें शादी करनी पड़ी। उन्होंने पीयू से सोशल वर्क में मास्टर की डिग्री हासिल की हुई है और ट्रांसजेंडरों को अधिकार दिलाने के लिए काम कर रहे हैं। ग्रेजुएशन में उन्होंने  टॉप किया था।  

खुद बताया कि ट्रांसजेंडर हैं
धनजंय के हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने खुलकर अपने पेरेंट्स, अपनी पत्नी, बच्चों और सोसाइटी को बताया कि वे एक ट्रांसजेंडर हैं। वे कहते हैं कि उन्हें न तो कोई शर्म है और न ही कोई हिचक। जब लोगों को पता चला कि वे ट्रांसजेंडर हैं तो शुरुआत में दिक्कते आई थीं, लेकिन बाद में सभी का मुकाबला करने की हिम्मत आ गई। उन्होंने बताया कि जब उनकी पत्नी को पता चला तो उन्होंने उनका साथ दिया। दोनों बच्चों को पता है कि उनके पिता ट्रांसजेंडर हैं और उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। वे पीजीआई में एक एनजीओ के साथ काम करते थे, लेकिन एनजीओ समय पर तनख्वाह नहीं देती थी।

ट्रांसजेंडर के लिए लड़ रहे हैं लड़ाई
धनजंय ट्रांसजेंडरों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए पिछले कई सालों से संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए सक्षम ट्रस्ट बना रखा है। ट्रस्ट के पास कोई फंड नहीं है। इसके बावजूद वे ट्रांसजेंडरों के लिए चंडीगढ़ में हर साल गर्व उत्सव, फिल्म फेस्टिवल, कालेज व यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट के साथ मिलकर सेमिनार करते हैं। उनके मुताबिक चंडीगढ़ में रजिस्टर्ड 1571 ट्रांसजेंडर आधार के साथ लिंक है। इसके अलावा हजार से ज्यादा अन्य ट्रांसजेंडर होंगे।

ट्रांसजेंडर के लिए मिसाल, मेहनत करके भरते हैं अपना पेट

ट्रांसजेंडर, विजेता - फोटो : demo pics
4. चाय की दुकान चलाते हैं विजेता
इंडस्ट्रियल एरिया फेज दो में चाय की दुकान चलाने वाले विजेता उन ट्रांसजेंडर के लिए एक मिसाल हैं, जो न तो मांग कर अपना पेट भरना चाहते हैं और न ही गैरकानूनी काम करके। विजेता ने अपने जीवन में वह सभी तकलीफे झेली हैं, जो एक आम ट्रांसजेंडर झेलता है। राह चलते अश्लील कमेंट मिलना, छेड़खानी, रहने के लिए किराए पर घर न मिलना, बचपन में स्कूल जाते वक्त शोषण और न जाने कितनी जिल्लतें। लेकिन इन सभी बाधाओं को विजेता ने न सिर्फ पार किया बल्कि अपना एक सम्मानित मुकाम भी बना लिया है। अब कोई भी उनके पास से गुजरता है तो या फिर उनकी दुकान पर जाता है तो झुककर सलाम करता है और बहुत ही अदब से बात करता है।

नाम था रुद्ध कुमार, टीचर बुलाते थे रुद्ध कुमारी
विजेता मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं। उन्होंने आठवीं तक पढ़ाई की। लेकिन स्कूल के दिनों से ही उनका शोषण शुरू हो गया था। वे बताते हैं कि उनके स्कूल का नाम रुद्ध कुमार था, लेकिन टीचर रुद्ध कुमारी के नाम से बुलाते थे। टीचर उनसे इशारों-इशारों में अश्लील कमेंट करते थे। उन्हें स्कूल खत्म होने के बाद कमरे में बुलाते थे। उसके बाद उनके घर वाले और खुद वे समझ गए थे कि पढ़ाई आगे मुश्किल हैं और फिर स्कूल नहीं गए। वे पश्चिम बंगाल से दिल्ली आ गए और फिर  दिल्ली से पिंजौर।

नृत्य दिखाया तब चला ढाबा
विजेता ने बताया कि वह जब पिंजौर आए तो उन्हें एक ढाबे में नौकरी मिल गई, लेकिन ढाबा चलता नहीं था। पूरे दिन एक भी ग्राहक नहीं आता था। वे भांप गए कि यदि ग्राहक नहीं आएगा तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए उन्होंने ढाबे के मालिक से कहा कि वे उन्हें एक टेपरिकार्डर लाकर दें। टेप रिकार्डर आने के बाद उन्होंने ढाबे पर नृत्य करना शुरू कर दिया। उन्हें देखने के लिए आसपास के लोगों की भीड़ जुटने लगी। फिर उन्होंने शर्त रखी कि नृत्य तभी दिखाएंगे, जब लोग उनके ढाबे से खाना खाएंगे। फिर क्या ग्राहकों की भीड़ लगने लगी। चार साल बाद वे चंडीगढ़ आ गए और चाय की दुकान चलाने लगे। पिछले 15 सालों से वे चाय की दुकान चला रहे हैं।

एक बच्चे को भी ले रखा है गोद
विजेता ने बताया कि चंडीगढ़ में जब उन्होंने चाय की दुकान खोली तो दुकान में एक बच्चा आ गया। बच्चा अकेला था। उसके माता-पिता की काफी खोजबीन की, लेकिन पता नहीं चल सका। विजेता ने उसे अपने पास ही रख लिया और बच्चा उनकी दुकान पर काम करने लगा। विजेता ने उसका नाम विष्णु रखा है। विष्णु उनके साथ ही घर पर रहता भी है। विष्णु की हर ख्वाहिश को विजेता पूरी करते हैं।

कोई छेड़खानी न करें, इसलिए साधु की तरह बनकर रहते हैं
विजेता को पहली नजर में कोई देखेगा तो यही लगेगा कि कोई साधु या फिर महात्मा हैं। जब उनसे पूछा गया कि आखिर वे इस वेष में क्यों रहते हैं तो उनका जवाब था कि रात के वक्त जब वे घर जाते हैं तो उन्हें डर रहता है कि कोई उनसे छेड़खानी न करें। उनका सरकार और सोसाइटी से कहना चाहते है कि यदि वह ट्रांसजेंडर हैं तो उनकी क्या गलती। सरकार ऐसे लोगों को नौकरी के लिए आरक्षण दे, ताकि वे भी एक सम्मानपूर्ण जिंदगी बिता सकें।
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ट्रांसजेंडर का मतलब मानसिक बीमारी नहीं

ट्रांसजेंडर - फोटो : demo pics
सेक्टर 35ए में डा. प्रमोद क्लीनिक के मनोचिकित्सक डा. प्रमोद कहते हैं कि ट्रांसजेंडर कोई मेंटल डिस्आर्डर नहीं है। अब तो सुप्रीमकोर्ट ने भी उसे तीसरे जेंडर के तौर पर मान्यता दे दी है। इनमें भी एक आम इंसान जैसी फीलिंग होती है। ट्रांसजेंडर को छिपाने के बजाए उसे स्वीकार करना चाहिए। पहले खुद को स्वीकार करना चाहिए। फिर पेरेंट्स को और फिर सोसाइटी को। यदि छिपाएंगे तो पहले खुद तनाव में आएंगे और फिर पेरेंट्स। उसके बाद सोसाइड करने के बारे में सोचते हैं।

ये कदम उठाने चाहिए
1.पहले खुद को स्वीकारे कि वे एक ट्रांसजेंडर हैं।
2.पेरेंट्स भी मानें कि उनका बच्चा ट्रांसजेंडर है।
3.इस बात को मान से निकाल लेना चाहिए कि  उनकी इसमें कोई गलती है।
4.सोसाइटी से छिपाना नहीं चाहिए, बल्कि बता देना चाहिए कि उनका बेटा ट्रांसजेंडर है।
5.यदि नहीं बताएंगे और बाद में सोसाइटी को पता चलेगा तो काफी दिक्कतें आती हैं।
6.ट्रांसजेंडर का सेक्स भी चेंज करवा सकते हैं।
7.सेक्स चेंज से पहले मरीज की मानसिक स्थिति का परीक्षण किया जाता है।
8.जांच के दौरान देखा जाता है कि सेक्स चेंज के बाद वह उस स्थिति में रह सकेगा कि नहीं
8.इसलिए छह महीने तक उसे ट्रेनिंग दी जाती है और उसी माहौल में रखा जाता है।

क्या होता है ट्रांसजेंडर 
ट्रांसजेंडर को लेकर आम लोगों में कई गलत अवधारणा है। विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रांसजेंडर एक आम आदमी की तरह होता है। एक आम इंसान में जितने अंग होते हैं, ठीक उतने ही अंग ट्रांसजेंडर में होते हैं। अंतर सिर्फ इतना होता है कि वे उसके अंदर अपोजिट सेक्स यानी महिलाओं जैसा विचार व स्वभाव होगा। यानी ऊपर से वह पूरी तरह से पुरुष होगा, लेकिन अंदर से उसकी भावनाएं महिला की हाेंगी। वह चाहे तो अपना सेक्स चेंज करवा सकता है। समाज में मिथ है कि ट्रांसजेंडर के शरीर में आधे अंग पुरुषों के होते हैं तो आधे अंग महिलाओं के, जबकि ऐसा नहीं होता है। अंदर भावनाएं अलग-अलग होंगी।

ये आती हैं मुश्किले
1.स्कूलों में अलग से कोई व्यवस्था नहीं।
2.इस कारण बचपन में ही स्कूल छोड़ना पड़ता है।।
3.कई बार तो शहर तक छोड़ना पड़ता है।
4.घर से बाहर निकलते अश्लील कमेंट व छेड़खानी का शिकार।
5.रहने के लिए किराए पर कमरा नहीं देता कोई।
6.सरकारी व प्राइवेट नौकरी में कोई प्रावधान नहीं।
7.विकास के लिए न तो कोई डेवलपमेंट व वेलफेयर बोर्ड नहीं।
8.समाज में ट्रांसजेंडरों के प्रति जागरूकता का न होना।
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