मोहाली के गांव नाडा व करोंरा की 1092 एकड़ भूमि को गैर वन भूमि मानने के बावजूद यहां बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध न करवाने व इसे राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज न करने पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने तीन आईएएस अधिकारियों को न्यायालय की अवमानना का दोषी माना है। वन विभाग के अतिरिक्त प्रमुख सचिव सह वित्तीय आयुक्त, मोहाली के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और स्थानीय निकाय विभाग के प्रधान सचिव को हाईकोर्ट ने उनका पक्ष रखने का मौका देते हुए सजा पर 20 नवंबर को फैसला लेने का निर्णय लिया है।
मोहाली की ग्राम पंचायत बड़ी करोंरा ने याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि 2010 में गांव बड़ी करोंरा और नाडा की 1092 एकड़ जमीन को पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट से डी-लिस्ट किया गया था। इसके साथ ही यह शर्त लगा दी गई थी कि यहां कोई व्यावसायिक गतिविधि या निर्माण नहीं होगा। इसके खिलाफ स्थानीय लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका पर 2014 में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि अगर यह वनभूमि नहीं है, तो यह शर्तें लागू नहीं होंगी। इसके साथ ही पंजाब सरकार को इसके लिए नोटिफिकेशन जारी करने का आदेश दिया था।
नहीं मिल रहे बिजली-पानी के कनेक्शन
इस मामले में याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि चूंकि गांव के निवासियों को इस तथ्य के कारण लगातार समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जब भी विकास कार्य शुरू करने या पानी या बिजली का कनेक्शन आदि प्राप्त करने के लिए कोई आवेदन दायर किया जाता है तो सभी विभाग संबंधितों ने 13 अगस्त, 2010 की अधिसूचनाओं का संदर्भ लेते हुए एनओसी देने से इन्कार करते हुए इसे वन भूमि मान कर उनकी मांग खारिज कर देते हैं।
अधिकारियों का आचरण उनके अड़ियल दिमाग को दर्शाता
2014 के आदेश के बाद नौ साल बीत जाने पर भी इस दिशा में निर्णय नहीं लिया गया, जिस पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि निर्देशों का पालन करने के लिए बार-बार समय देने के बावजूद ऐसा नहीं हुआ। ऐसे में अधिकारियों का आचरण न केवल जानबूझकर अवज्ञा की श्रेणी में आता है, बल्कि उनके अड़ियल दिमाग को भी दर्शाता है। अधिकारी निर्देशों का पालन करने के स्थान पर एक-दूसरे पर दोष डालते रहे जिसके चलते अदालत और नागरिकों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।