पीजीआई कर्मचारी संघ (गैर-संकाय) ने इस मामले को पीजीआई प्रशासन के समक्ष भी उठाया। पीजीआई निदेशक प्रो. विवेक लाल की अध्यक्षता में आयोजित एक बैठक में इस विषय को लेकर आयोग के निर्णयों की प्रति मांगी गई जो प्रदान की गई लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ। याची पक्ष ने हाईकोर्ट को बताया कि विभिन्न संवर्गों में 300 से अधिक श्रेणियों में हजारों पद रिक्त पड़े हैं।
आयोग के इस अवैध और मनमाने आदेश के कारण इन पदों पर कर्मी काम नहीं कर पा रहे हैं जिसका खामियाजा मरीजों समेत अन्य को भी भुगतना पड़ रहा है। याची ने पीजीआई प्रबंधन से गुहार लगाई और पदोन्नति के लिए डीपीसी की बैठक बुलाने की मांग की लेकिन ऐसा नहीं किया गया। याची ने दलील दी कि आयोग का यह निर्णय कर्मियों के पदोन्नति के मौलिक अधिकार का हनन है और ऐसे में इसे खारिज किया जाए।
जस्टिस मनोज बजाज ने याची पक्ष की दलीलें सुनने के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के आदेश का पीजीआई को पालन न करने का आदेश दिया है। ऐसे में कर्मियों की पदोन्नति के लिए आयोजित होने वाली डीपीसी का रास्ता हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है।