जिसमें सात लोगों को आरोपी बनाया गया था। मामले में अदालत में याचिकाकर्ता रामफल निवासी खरक, मृतक हरिसिंह के बेटे बिजेंद्र, खरक निवासी महेंद्र, महम से विधायक आनंद सिंह दांगी के भाई मदीना निवासी धर्मपाल, एसपी आफिस के रिकार्ड कीपर सत्यनारायण व महम थाने के एएसआई जगदीश की गवाही हुई।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने मार्च 2017 में याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद जुलाई 2018 में रामफल ने इस फैसले को एडीजे फखरुद्दीन की अदालत में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के वकील एडवोकेट एसएस सांगवान ने बताया कि एडीजे की अदालत ने मामले में आरोपी अभय चौटाला सहित सात लोगों को नोटिस किए थे, लेकिन एक आरोपी डीएसपी सुखदेव राणा का देहांत हो चुका है, जबकि दूसरे आरोपी सुरेंद्र के वकील अदालत में पेश हुए।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसने महम पुलिस स्टेशन में 28 फरवरी 1990 को एफआईआर के लिए शिकायत दी, लेकिन पुलिस ने 1 मार्च 1990 को एफआईआर दर्ज की। उसमें आरोपियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। आरोप है कि पुलिस ने उसके भाई हरी सिंह का पोस्टमार्टम नहीं होने दिया। खुद ही पुलिस ने अंतिम संस्कार कर दिया। अदालत ने अपील को स्वीकार करते हुए सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया था।
ये था महम कांड
1989 में देवीलाल देश के उप प्रधानमंत्री थे। उनकी जगह चौधरी ओमप्रकाश चौटाला प्रदेश के सीएम बने। उस समय चौटाला विधानसभा के सदस्य नहीं थे। नियमों के तहत मुख्यमंत्री बने रहने के लिए छह माह के अंदर उनका विधानसभा का सदस्य होना अनिवार्य था। चौधरी देवीलाल ने सांसद बनने के बाद महम विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था।
ऐसे में विधानसभा की महम सीट खाली थी। जिसके बाद उपचुनाव 27 फरवरी 1990 हुआ। जहां से तत्कालीन सीएम ओमप्रकाश चौटाला ने चुनाव लड़े। उसी समय कांग्रेस के मौजूदा विधायक आनंद सिंह दांगी ने हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के चेयरमैन से इस्तीफा देकर चुनाव लड़ा। चुनाव में धांधली की शिकायतों पर अगले ही दिन आठ मतदान केंद्रों बैंसी, चांदी, महम, भैणी महाराजपुर और खरैंटी में पुनर्मतदान कराने का फैसला किया। पुनर्मतदान के दिन हिंसा हो गई। हिंसा में 10 लोग मारे गए, जिसमें याचिकाकर्ता रामफल का भाई हरीसिंह भी शामिल था।