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Chandigarh Mayor Chunav: क्यों धड़ाम हुआ आप-कांग्रेस का गठबंधन? भाजपा की जीत और AAP की हार के ये 10 कारण

Thu, 30 Jan 2025 10:19 PM IST
अंकेश ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

भले ही कांग्रेस ने सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर पद पर जीत हासिल की है, लेकिन कांग्रेस और आप गठबंधन के बावजूद भाजपा ने मेयर पद पर कब्जा किया है। आप की हार और भाजपा की जीत के ये 10 मुख्य कारण रहे हैं। 
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चंडीगढ़ की नई मेयर हरप्रीत कौर बबला। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चंडीगढ़ मेयर चुनाव काफी दिलचस्प रहा। क्योंकि बिना बहुमत के आंकड़े वाली भाजपा की उम्मीदवार हरप्रीत कौर बबला 19 वोट लेकर मेयर की कुर्सी तक पहुंची। वहीं आप- कांग्रेस गठबंधन की प्रेमलता को 16 वोट मिले और वह तीन वोट से हार गई। हालांकि कांग्रेस और आप के पास 20 वोट थे। तीन वोटों का हेरफेर आप और कांग्रेस के ही पार्षदों ने किया और उन्होंने क्रॉस वोटिंग कर भाजपा की हरप्रीत कौर बबला को वोट दिए। 

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मेयर चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन पार्षदों के निजी हितों के आगे टिक नहीं सका। आप के भीतर असंतोष पहले से भरा था जबकि कांग्रेस के कुछ पार्षद भी उम्मीदवार से नाखुश थे। क्रॉस वोटिंग ने न सिर्फ गठबंधन की रणनीति को झटका दिया बल्कि यह भी साबित किया कि वरिष्ठ नेताओं की अपील भी बेअसर रही। कई कारणों से यह गठबंधन धराशायी हो गया। 

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मेयर चुनाव में हार के बाद आप पार्षद हुए मायूस। - फोटो : अमर उजाला

आप के हार के पांच कारण

गठबंधन में विश्वास की कमी : दोनों पार्टियां गठबंधन में थी लेकिन एक भी संयुक्त प्रेस वार्ता नहीं हुई। नामांकन भी साथ नहीं भरा। शहर से दूर भी अलग-अलग जगह गए। दोनों पार्टियों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास की काफी कमी थी।
उम्मीदवार का चयन : उम्मीदवार की घोषणा के बाद कांग्रेस के कुछ पार्षद खुश नहीं थे। आप के कुछ पार्षद भी नाराज थे, लेकिन वरिष्ठ नेताओं के दबाव के आगे वह अपना गुस्सा नहीं जाहिर कर पाए।
संगठन का बिखराव : आप के अंदर पिछले दो साल से संगठन को लेकर संघर्ष चल रहा है। पहले करीब एक साल पार्टी बिना किसी प्रदेश अध्यक्ष के रही। जब गठन हुआ तो पार्टी में ही जंग छिड़ गई। मनचाहा पद न मिलने से कई नाराज रहे।
बाहर अलग-अलग रहना : अपने पार्षदों को बचाने के लिए कांग्रेस लुधियाना तो आप रोपड़ के लॉज में पार्षदों को ले गई। इससे दोनों की अलग-अलग किचड़ी पकी। पार्टियों में संवाद की कमी तो थी ही। रणनीति भी नहीं बन पाई, न पार्षद भांप पाए कि किसके मन में क्या चल रहा है।
अहलूवालिया को लेकर असंतोष : पार्टी के अंदर एक तबका है तो सह-प्रभारी डॉ. एसएस अहलूवालिया को पसंद नहीं करता है। पार्षद पूनम के पति संदीप ने भी पुतला फूंकने की चेतावनी थी और हार के बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेता विक्रम पुंडीर ने अहलूवालिया के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और वापस जाने की मांग की।
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परिवार के साथ भावुक हुईं नई मेयर हरप्रीत कौर बबला। - फोटो : अमर उजाला

भाजपा के जीत के पांच कारण

केंद्र में सरकार : चंडीगढ़ एक केंद्र शासित प्रदेश है। यहां पैसा और अधिकारी केंद्र से आते हैं। कई अधिकारियों व पार्षदों की जुबान पर था कि निगम को तभी पैसा मिल पाएगा, जब भाजपा का मेयर बनेगा। काम प्रभावित हो रहे थे। ऐसे में इस फैक्टर ने भी काम किया।
पार्टी की एकजुटता : भाजपा के पार्षदों ने पूरा अनुशासन दिखाया। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद पार्टी के अंदर कोई असंतोष खुलकर बाहर नहीं आया। पार्षदों को कहीं बाहर भी नहीं ले जाना पड़ा। नेताओं ने अच्छा मैनेजमेंट किया। पार्टी ने सभी को साथ रखा और रोजाना मिलते-जुलते रहे।
बबला का प्रभाव : हरप्रीत कौर बबला के पति दविंदर बबला दो बार कांग्रेस की टिकट पर ही पार्षद रहे हैं। उन्होंने जीवन के अधिकतर साल कांग्रेस में ही बिताए हैं। राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। बेटे युद्धवीर और परमबीर ने हरप्रीत कौर की सभी रणनीति बनाई और लागू किया।
गठबंधन की कमजोरी पकड़ी : भाजपा ने गठबंधन की कमजोरी भांप ली थी कि उनमें विश्वास की कमी है। इसी को हथियार की तरह इस्तेमाल किया। असंतोष पार्षदों से संपर्क किया गया। गुरबख्त रावत को पार्टी में शामिल कराकर एक वोट बढ़ा लिया।
मेयर चुनाव में देरी : मेयर चुनाव पहले 24 जनवरी को होने थे। आम आदमी पार्टी ने ही हाईकोर्ट जाकर तिथि बढ़वाई। इससे भाजपा को तैयारी का समय मिल गया और उन्होंने एक पार्षद को तोड़ने के साथ कइयों के साथ संपर्क साधने में सफल हो गए।
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