डॉ. प्रशांत के तैयार किए सिस्टम के जरिये डॉक्टर के पास जाने से पूर्व व्यक्ति जान सकेगा कि उसे अर्थराइटिस है या नहीं। अगर है तो वह कितना गंभीर है। इससे इलाज से पूर्व बीमारी पकड़ में आना आसान होगा। सिस्टम में थर्मल इमेजिंग के जरिए पहले थर्मल कैमरा घुटनों की तस्वीर लेगा। सॉफ्टवेयर उसका एनालिसिस करेगा और अर्थराइटिस होने न होने के बारे में बताएगा। सॉफ्टवेयर में अलग-अलग विंडो बनाए गए हैं। इसमें मरीज का पंजीकरण, पुराने मरीज की अलग विंडो, स्टैंडर्ड क्वेशयनेयर, जिसमें अर्थराइटिस से जुड़े सामान्य प्रश्न पूछे जाएंगे, जैसे जोड़ों में कितना दर्द रहता है, कितनी मूवमेंट होती है, कितनी कठोरता महसूस होती है आदि। इन प्रश्नों के जरिए अर्थराइटिस के स्तर का पता लग सकेगा।
थर्मल इमेजिंग सॉफ्ट टिशू के रोग पहचानने में एक्स-रे, एमआरआई से बेहतर
डाॅ. प्रशांत ने सॉफ्ट टिशू के रोग की पहचान करने के लिए थर्मल इमेजिंग को एक्स-रे, एमआरआई, सीएटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड से बेहतर बताया है। एक्स-रे, एमआरआई में पाई जाने वाली रेडियोएक्टिव रेज लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं। थर्मल इमेजिंग में रेडियोएक्टिव रेज नहीं होती। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड आदि सिर्फ शरीर के ढांचे को स्कैन करते हैं, जबकि थर्मल इमेजिंग में शरीर के कार्य की तस्वीर ली जाती है। यह शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल रोगों की पहचान करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।