चंडीगढ़। बचपन में मां की डांट अक्सर बुरी लगती थी। टीवी बंद करने को कहना, देर रात बाहर जाने से रोकना, गलत दोस्तों से दूर रहने की सलाह देना या पढ़ाई के लिए बार-बार टोकना... उस समय यह सख्ती लगता था। बड़े होने पर समझ आता है कि हर डांट के पीछे मां का डर छिपा था। बच्चे के बिगड़ने, चोट लगने का डर और जिंदगी में असफल होने का डर। मदर्स डे पर मां के इसी सख्त लेकिन संवेदनशील रूप को समझने की जरूरत है। मां की डांट में नाराजगी कम और चिंता ज्यादा होती है। यही वजह है कि बाहर से सख्त दिखने वाली मां अंदर से सबसे ज्यादा भावुक होती है।
पीजीआई के मनोचिकित्सा विभाग की पूर्व प्रोफेसर डॉ. आदर्श कोहली का कहना है कि मां का अनुशासन बच्चों को सिर्फ सही रास्ते पर ही नहीं ले जाता बल्कि जिंदगी की कई गलतियों से भी बचाता है। मां की रोक-टोक बच्चों के व्यवहार और सोच को संतुलित करने में मदद करती है। डॉ. कोहली यह भी कहती हैं कि आज के दौर में डांटने का तरीका बदलना जरूरी है। छोटे बच्चे भी अब शब्दों और आवाज के लहजे को समझने लगे हैं। ऐसे में गुस्से, अपमान या डराने की बजाय समझाने वाला व्यवहार ज्यादा असरदार साबित होता है। उनका कहना है कि बच्चे की उम्र के साथ अनुशासन का तरीका भी बदलना चाहिए।