पंजाब कला भवन में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में चल रहे थिएटर फेस्टिवल के अंतिम दिन एक महिला की जिंदगी पर आधारित नाटक ‘गुलबानो’ का मंचन किया गया। इस नाटक के साथ ही पांच दिवसीय थिएटर फेस्टिवल का समापन हो गया। रूपक कला केंद्र सोसायटी की ओर से वीणा शर्मा द्वारा लिखित नाटक ‘गुलबानो’ का निर्देशन संगीता गुप्ता ने किया।
‘गुलबानो’ कहानी है एक ऐसी महिला गुलबानो की। जिसने जिंदगी के 40 साल एक हवेली में काट दिए। वह भी उस गुनाह में, जिसमें वह अकेली नहीं थी। इस नाटक के जरिये कलाकारों ने यह बताने की कोशिश की कि कैसे एक महिला का लिया हुआ गलत फैसला उसकी पूरी जिंदगी को तबाह कर सकता है। कलाकारों ने नाटक का अंत एक कविता के साथ किया।
ये है कहानी
नाटक की कहानी गुलबानो नाम की एक ऐसी युवती की है, जिसे फिरोज नामक युवक से प्यार हो जाता है। हालांकि फिरोज पहले से शादीशुदा है। लेकिन इसकी जानकारी गुलबानो को नहीं है। गुलबानो तो बस उसके रंग-रूप पर फिदा है। दोनों के प्यार की खबर पूरे गांव को लग जाती है। इस पर फिरोज गुलबानो को घर से भगाकर ले जाता है और गांव में अपने पिता से मिलवाता है। उसके पिता जो गांव के सरपंच भी हैं, उसके इस कदम को गलत ठहराते हैं।
इस पर फिरोज गुलबानो से निकाह करने का प्रस्ताव रखता है और कहता है कि इस्लाम उसे 4 शादी करने की इजाजत देता है। इस पर उसके पिता जवाब देते हैं कि इस्लाम बेसहारों को सहारा देने के लिए चार शादी की इजाजत देता है न कि अय्याशी की। इस पर यह मुद्दा पंचायत तक पहुंचता है। यहां गुलबानो कहती है कि अब वह वापस घर नहीं जा सकती है। अगर वह घर गई तो उसके भाई उसे जान से मार देंगे। इस पर पंचायत गुलबानो की शादी फिरोज के चचेरे भाई आमिर से करने का फैसला लेती है।
आमिर गुलबानो से 20 वर्ष बड़ा है। हालात को देखते हुए गुलबानों को फैसला मानना पड़ता है। शादी के दिन ही आमिर गुलबानों से कहता है कि उसे परेशान होने की जरूरत नहीं वह इस हवेली में एक मेहमान की तरह है। समाज के सामने वह उसकी पत्नी जरूर है, लेकिन केवल समाज के सामने। समय बीतने के साथ गुलबानो को आमिर की अच्छाइयां पता चलती जाती हैं। आखिरकार एक दिन वह उसे दिल से अपना लेती है। इसके बाद दोनों के तीन बेटियां और एक बेटा होता है। बच्चों के बीच गुलबानों की जिदंगी बदल जाती है।
वह बेटे को पढ़ने के लिए विदेश भेज देते हैं। वहां गुलबानों के बेटे को फिरोज की बेटी से प्यार हो जाता है। एक दिन वह मां गुलबानों से फिरोज की बेटी से शादी करने की इच्छा जाहिर करता है। वह इससे इंकार कर देती है। इस पर उसका बेटा उसे जवाब देता है कि, तुम्हें तो फिरोज ने ठुकराया था, उसके बाद पिता ने उससे शादी की। मैं किसी ठुकराई हुई नहीं बल्कि पढ़ी-लिखी लड़की से शादी कर रहा हूं। इतना सुनते ही गुलबानों टूट जाती है और अतीत में हुई गलती को याद करती है कि कैसे उसकी एक गलती का खामियाजा वह आज तक भुगत रही है।
20 दिन में सीखी पंजाबी
नाटक ‘गुलबानो’ के सभी कलाकारों ने पहली बार अभिनय किया है। खास बात यह है कि इसमें शामिल होने वाली कोई भी कलाकार पंजाब पृष्ठभूमि से नहीं है। कोई हरियाणा तो कोई हिमाचल से है। गुलबानों का किरदार शिवानी और रितिका ने तो फिरोज का किरदार रागेश्वरी ने निभाया। आमिर का किरदार राशि ने निभाया। जबकि अन्य किरदारों को मृदुला, मयूरी, प्रतिभा और प्रियंका ने जीवंत किया। सभी कलाकारों ने इस पंजाबी नाटक के लिए 20 दिन में पंजाबी सीखी।