‘पहले कला को प्यार किया जाता था, अब तो पैसों के पीछे कलाकार भागते हैं। ये कहना है बैंडिट क्वीन फेम सीमा बिस्वास का। वे चंडीगढ़ आई थीं और यहां उन्होंने रंगमंच के प्रति लोगों के रुझान पर अपने विचार अमर उजाला से साझा किए। उन्होंने कहा कि ‘पहले कला को प्यार किया जाता था, अब तो पैसों के पीछे कलाकार भागते हैं। एंटरटेनमेंट के तौर पर अब सिनेमा को पसंद किया जाता है, रंगमंच तो उनकी जिंदगी में कहीं आता ही नहीं है।
आज लोग सिनेमा मॉल में जाकर टिकट खरीदकर फिल्म देखते हैं। लेकिन सिनेमा हाल में वह पॉपकोर्न पर पैसे खर्च कर देते हैं लेकिन रंगमंच के लिए टिकट के रूप में कुछ पैसे देने का उनमें साहस नहीं होता।’ रंगमंच पर बात करते हुए वह कहती हैं कि असल में थिएटर लवर वो हैं जो उसमें एक्ट करने वाले स्टार्स को देखकर प्ले देखने नहीं आते बल्कि रंगमंच के लिए आते हैं।
मुझे अच्छा लगता है जब लोग सीमा के कारण नहीं बल्कि रंगमंच के लिए हॉल में आते हैं। एक कलाकार के रूप में थिएटर को बढ़ाने के लिए अपने प्रयासों पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि एनएसडी के स्टूडेंट्स नेपाल जैसे देशों में भी जाकर थिएटर के स्तर को बढ़ा रहे हैं। वहां पर थिएटर के लिए टिकट रखी गई है और वहां पर एक रिक्शे वाला भी टिकट लेकर नाटक देखने जाता है।
शुरू में हिंदी नहीं बोल पाती थी
सीमा विश्वास बताती हैं कि जब सफदर हाशमी द्वारा लिखे नाटक पर आधारित एक टीवी सीरियल को गुरबीर गरेवाल डायरेक्ट कर रहे थे, तो उनकी हिंदी सुनकर डांटते हुए कहा कि इतनी अच्छी आर्टिस्ट और इतनी खराब हिंदी। शर्म आनी चाहिए। उस दिन उनकी बात सुनकर ठान लिया कि अगर इस इंडस्ट्री में रहना है तो अपनी हिंदी पर काम करना ही पडे़गा। मेहनत की और यह मुकाम हासिल करने में कामयाब हुई।
ऑडियंस के रिएक्शन पर एक्शन
अपने अभिनय पर बात करते हुए वह बताती हैं कि एक एक्टर के लिए उसकी ऑडियंस ही सब कुछ होती है। जब मंच पर उनका समर्थन मिलता है तो अपने ही कैरेक्टर उभर के आने लग पड़ता है।