लुधियाना। अमेरिकी डॉलर की लगातार मजबूती का असर देश की इंजीनियरिंग और स्टील इंडस्ट्री पर साफ़ नजर आने लगा है। बीते एक साल में डॉलर करीब चार रुपये मजबूत होकर 90 रुपये के स्तर को पार कर गया, जबकि 2025 की शुरुआत में यह लगभग 86 रुपये पर था। डॉलर में आई इस तेजी के कारण आयातित कच्चे माल की लागत बढ़ गई, जिसका सबसे बड़ा असर लोहे और स्टील उत्पादों पर पड़ा है।
उद्योग सूत्रों के अनुसार पिछले दो महीनों में इंगट (कुल्फी) की कीमत 38,400 रुपये से बढ़कर 41,800 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है। इस बढ़ोतरी ने इंजीनियरिंग, साइकिल, नट-बोल्ट, सिलाई मशीन, फाउंड्री और लघु उद्योगों को बड़ा झटका दिया है।
केके गर्ग, इंडक्शन फर्नेस एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ इंडिया के प्रधान, का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी का सबसे अधिक नुकसान इंडक्शन फर्नेस और री-रोलिंग सेक्टर को हो रहा है। डॉलर महंगा होने से कच्चे माल की लागत बढ़ रही है, जबकि तैयार माल के दाम उसी अनुपात में बढ़ाना संभव नहीं है।
देव गुप्ता, महासचिव, ने बताया कि भारत चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस और इंडोनेशिया से स्टील उत्पादों का बड़े पैमाने पर आयात करता है। डॉलर महंगा होने पर हर खेप पर उद्योगों को करोड़ों रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ते हैं।
भविष्य की चुनौतियां
रजनीश आहूजा, एपेक्स चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रधान, ने चेतावनी दी कि यदि डॉलर की कीमत और बढ़ी तो मशीनरी, ऑटो पार्ट्स, साइकिल पार्ट्स, हैंड टूल्स और कृषि उपकरण महंगे हो जाएंगे। इससे घरेलू महंगाई बढ़ेगी और निर्यात प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी। कारोबारी भी कहते हैं कि अगर डॉलर 90 रुपये से ऊपर टिकता है, तो इंजीनियरिंग सेक्टर में उत्पादन घटने, मुनाफा सिमटने और रोजगार पर असर पड़ सकता है। उद्योग संगठनों ने सरकार से रुपये को स्थिर रखने, आयात शुल्क की समीक्षा और घरेलू स्टील उत्पादन को बढ़ावा देने की मांग की है। कच्चे माल की महंगाई की आशंका के चलते कारोबारी नए सौदे करने से हिचकिचा रहे हैं। जब तक कीमतें स्थिर नहीं होंगी, उद्योग जगत की चिंता बनी रहेगी।