चंडीगढ़। हर रोज जद मैं सोनी हां मैनू इंज जापदा जिमें करीमां मेरी कुख च आण पेया, ते मैनूं मेरी धड़कन नाल इक होर धड़कन सुनाई देंदी है। यह भावुक कर देने वाला शानदार संवाद नाटक दौले शाह के चूहे... में फातिमा की भूमिका निभा रहीं सुहानी शर्मा ने आबिदा की भूमिका निभा रही जपजी कौर के साथ किया।
यह संवाद तब हुआ जब आबिदा अपने बच्चे को मजार पर चढ़ाने के लिए जाती है और फातिमा उसे समझाती है। फिर वह मान जाती है। नाटक का संदेश है कि धर्म के ठेकेदारों से बचना है। भ्रम में कभी भी नहीं रहना चाहिए। यह नाटक महमदीयां तंदा की ओर से पेश किया गया। इसका लेखन संत दीप बेनीवाल ने किया है। अविंदर राजू के निर्देशन में पांच वर्ष से लेकर 53 वर्ष के 70 कलाकारों ने मंचन किया। यह नाटक महकदीयां तंदां की कलाकार कोमलप्रीत की याद को समर्पित है। सितंबर-2024 में उनकी मौत हो गई थी।
नाटक दौले शाह के चूहे में 400 साल पुरानी पाकिस्तान की एक मजार की कहानी है। कहानी यह है कि जिस जोड़े को संतान नहीं होती वह मन्नत मांगने के लिए मजार पर जाते थे। वहां का नियम है कि पहला बच्चा मजार पर चढ़ाना होता था। चाहे वह लड़का हो या लड़की। उन बच्चों के सिर पर लोहे का टोप चढ़ाया जाता था ताकि उनका सिर न बढ़े। उनका सिर छोटा होता था और वह चेहरे से चूहे जैसे दिखते थे। इसके बाद इन बच्चों से भीख मंगवाई जाती है और कई गलत भी काम करवाए जाते थे। यह प्रथा काफी वर्षों तक चली। लेकिन जब लोगों को बात समझ में आती है तो फिर मजार के साई को मार देते हैं और सभी बच्चों यानी चूहों को आजाद करवा देते हैं।
नाटक में हरमन सिंह ने साई की भूमिका निभाई जबकि उसका नजदीकी सैदा की भूमिका सुखप्रीत सिंह ने निभाई। जोड़े में जफर अली ने अली की और सुहानी शर्मा ने अली की पत्नी पत्नी फातिमा की भूमिका निभाई। रिवाल्विंग सेट में एक तरफ मजार तो दूसरी तरफ घर के दृश्यों को दिखाया गया। नाटक में गीत संगीत भरपूर रहा। लुडडी, भंगडा, गिद्दा, झूमर और जिंदुआ नृत्य की प्रस्तुति हुई। दर्शकों ने तालियां बजाकर कलाकारों का हौसला बढ़ाया। महकदीयां तंदा के प्रधान सतविंदर सिंह बिल्ला, महासचिव जगमीत सिंह के अलावा कमेटी के सदस्यों में ओमकार मोहन सिंह, हर्षित ठाकुर, हरजोत सिंह, जितेंद्र सिंह सहित बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे।