साल 1970 में लखनऊ के सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बीपी की दवा खोज की थी। 15 साल बाद वह बीपी को कंट्रोल करने में नकामयाब साबित हुई। शिकागो के एक डॉक्टर ने उस पुरानी दवा को लिया और उसमें कुछ नए मॉलीक्यूल डाले। करीब तीन से चार साल की उनकी मेहनत रंग लाई और एक दूसरी महत्वपूर्ण बीमारी लेक्टेट लेवल को कंट्रोल करने में कामयाबी हासिल हुई।
पीजीआई में फार्माकोलॉजी की चल रही वर्कशॉप में पहुंचे शिकागो के रिसर्च इंस्टीट्यूट के डीन डॉ. अनिल गुलाटी ने बताया कि जब किसी एक्सीडेंट में घायल व्यक्ति का खून लगातार बहता है तो ब्लड का लेक्टेट लेवल कम हो जाता है। इससे व्यक्ति की मौत होने का खतरा बढ़ जाता है।
यह दवा लेक्टेट लेवल को कंट्रोल करता है और मरीज की जान बचाने में मददगार साबित होगा। कामयाबी के बाद यूनिवर्सिटी ने इस दवा का पेटेंट तीन देशों में करा लिया है। कई और देशों में इसके पेटेंट के लिए तैयारी चल रही है। उन्होंने इस दवा का नाम सेंथाक्विन रखा है।