चंडीगढ़। बहारों ने यूं तो पुकारा बहुत है, मगर दर्दे दिल हमको प्यारा बहुत है.. सुशील ‘हसरत’ नरेलवी ने जब अपनी गजल पेश की तो सभी ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया। मौका था रविवार को हिंदी साहित्य के प्रयोगवादी कवि, निबंधकार एवं आलोचक केदारनाथ सिंह के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आयोजित ऑनलाइन शब्द-सुमन समारोह एवं कवि सम्मेलन का। यह कार्यक्रम उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र पटियाला के सौजन्य से ‘गूगल मीट एप’ के माध्यम से किया गया।
यह कार्यक्रम वरिष्ठ साहित्यकार बी.डी. कालिया ‘हमदम’ की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। मंच संचालन कवि वीरेन्द्र शर्मा ‘वीर’ ने किया। इसके बाद बाद एनजेडसीसी के निदेशक प्रोफेसर सौभाग्य वर्द्धन ने केदारनाथ सिंह की कुछ स्मृतियों को श्रोताओं के समक्ष रखा। इसके बाद शुरू हुआ कविताओं और गजलों का दौर। कवि प्रेम विज ने केदारनाथ सिंह की कविताएं खोल दूं यह आज का दिन.. प्रस्तुत की। वीरेंद्र शर्मा ‘वीर’ ने केदारनाथ की कविताएं ‘अकाल में दूब’ व ‘शाम बेच दी है’ प्रस्तुत कीं। कवयित्री नेहा अरोड़ा ने केदारनाथ की कविता ‘बाघ’- पैरों से पूछ रहे हैं जूते, गरदन से पूछ रहे हैं बाल, नखों से पूछ रहे हैं कंधे, बदन से पूछ रही है खाल, कि कब आएगा, फिर कब आएगा बाघ.. सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
शायर बी.डी. कालिया ‘हमदम’ ने गजल का मैं तो दीवाना हूं ‘हमदम’ गजल भी मेरी दीवानी बहुत है.. सुनाई। चमन शर्मा ‘चमन’ ने अपनी गजल ‘फूलों की तरह तू कभी खुल कर खिला तो कर’ सुनाकर समा बांध दिया। इनके अलावा कवि भूपेंद्र ‘भूपी’ और कवयित्री आशा शर्मा ने अपनी रचना से खूब ताली बोटरी।
‘वीर’ ने डाला केदारनाथ सिंह के जीवन पर प्रकाश
कवि वीरेन्द्र शर्मा ‘वीर’ ने केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में जन्मे केदारनाथ सिंह कवि होने के साथ ही एक श्रेष्ठ अध्यापक भी थे। उनकी कविताएं जनपदीय शब्दावली, ठेठ ग्रामीण विषय की प्रमुखता एवं भाषा की सहजता व बिंब की सादगी के लिए जानी जाती हैं।