लेखन की बात हो तो युवा कैसे पीछे रह सकते हैं। कम उम्र में ही देश के युवाओं ने अच्छे लेखनकार्य से दबदबा बनाया हुआ है। उनके लेखन में दर्द के साथ तड़प है तो लिखने का मकसद भी। ये इस बारे में नहीं सोचते कि उनके पास पब्लिशर है या नहीं। यदि किसी का साथ नहीं मिला तो डिजिटल प्लेट में अपनी किताब प्रकाशित कर दी। एक नजर डालते हैं चंडीगढ़ के उन युवाओं पर जिन्होंने अपने लेखन से लोगों का ध्यान खींचा है।
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माता-पिता से मिली लिखने की प्रेरणा
पंजाब यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कालर हरप्रीत सिंह हिंदी व अंग्रेजी की तीन किताबों का पंजाबी ट्रांसलेट कर चुके हैं। एक पंजाबी कविता पर भी किताब लिख चुके हैं। मूल रूप से जालंधर के रहने वाले हरप्रीत सिंह ने बताया कि उनके माता-पिता प्रगतिशील लेखकों की किताबें पढ़ते थे। लगभग 10वीं कक्षा से वे भी उनको देखकर घर में उपन्यास और कविताएं पढ़ने लगे थे। यही से किताबें पढ़ने का सफर शुरू हुआ।
साल 2012 में बीए के दौरान न्यूज पेपर के लिए रिसर्च व इतिहास पर लेखन शुरू किया। साथ ही उन्होंने पंजाबी भाषा और कविता पर रिसर्च पेपर लिखे। इसके बाद उन्होंने पीयू से पंजाबी में पीएचडी की। हरप्रीत दलित और समाजिक मुद्दों पर लिखना पंसद करते हैं। इसके साथ ही उनका मानना है कि हमें ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रीय भाषा में विभिन्न देशों के साहित्य का अनुवाद करना चाहिए। इससे लोगों को विभिन्न देशों की संस्कृतियों और समाज को समझने में मदद मिलेगी।
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डॉ. हरप्रीत सिंह की किताबें
1. जूठ - 2 ओम प्रकाश वाल्मीकी - ट्रांसलेशन - पंजाबी
2. दलित साहित दा सोहज शास्त्र - ओम प्रकाश वाल्मिकी - ट्रांसलेशन - पंजाबी
3. राहदारी दी उडीक विच - ( वेटिंग फॉर ए वीजा) डॉ. बीआर अंबेडकर - ट्रासंलेशन - पंजाबी
4. समकाली पंजाबी कविता - परिपेख ते पसार - डॉ. हरप्रीत सिंह - 2020
एनीमी देखकर लिखने लगे कहानियां
पंजाब यूनिवर्सिटी के हास्टल में रहने वाले अंशुल को बचपन से ही एनीमी देखने का शौक था। वे इस समय यूआईटी से इंजीनियरिंग कर रहे हैं। 10 साल की उम्र से ही वो फंटेसी कहानियां लिखने लगे थे। लेकिन उन्हें अपनी एनीमी कहानियों को पब्लिश करवाने के लिए कोई प्लेटफॉर्म नहीं मिला।
घर पर कोई उनके एनीमी में रूचि को समझने वाला नहीं था, जबकि परिजनों की ख्वाहिश थी कि वे इंजीनियर बनें। अंशुल ने बीटेक में एडमिशन के बाद अपनी रुचि पर काम करना शुरू कर दिया। अभी तक वह अपनी दो स्टोरी डिजीटल प्लटेफॉर्म पर पब्लिश कर चुके हैं। उनका कहना है कि वह एनीमी राइटर बनना चाहते हैं। इसमें कैरियर बनाने के लिए बीटेक के बाद वह जापान जाना चाहते हैं।
अशुंल की किताबें
1. द लेजेंडरी क्रॉनिकल्स ऑफ रेनकारनेटेड प्रिंस (एलसीआर), वेबसाइट - वैबनोवेल
2. लेजेंडरी ड्रैगन गॉड, वेबसाइट - मूनक्विल
पहले लेखकों की समीक्षा की, फिर लेखन शुरू किया
पंचकूला के अंकित नरवाल अक्सर असमंजस में रहते थे कि किसी लेखक को किस आधार पर साहित्य अकादमी व अन्य पुरस्कार दिए जाते हैं। इन्ही सब प्रश्नों को जानने के लिए उन्होंने साहित्य पढ़ना शुरू किया। लेखकों और उनके लेखन शैली को समझने की कोशिश की। इसके बाद उन्होंने पहले 18 साहित्य अकादमी पुरस्कार जीतने वाले लेखकों की सूची बनाई और उन्हें पढ़ा। इसके साथ ही एक आलोचक के तौर पर उनकी समीक्षा की।
इसी दौरान उन्होंने अपनी पहली किताब 2017 में ‘अठारह उपन्यास अठारह प्रश्न’ लिखी। अपनी लेखन का सफर उन्होंने ब्लॉग राइटिंग से शुरू किया था। वे अब तक तीन किताबे लिख चुके हैं। अंकित ने बताया कि अगर कोई युवा लिखना चाहता है तो शुरूआत के लिए फेसबुक और ब्लॉग अच्छा माध्यम हैं। फेसबुक पर अच्छे लेखकों के साथ जुड़ें। जिससे आपके लेखन की समीक्षा भी होती रहेगी।
अंकित की किताबें
अठारह उपन्यास अठारह प्रश्न - 2017
हिंदी कहानी का समकाल - 2018
यूआर अनंतमूर्ति : प्रतिरोध का विकल्प - 2019
पीयू हास्टल में रहने वाले वाहिद ने बताया कि उनके पिता लेबर का काम करते हैं और माता गृहणी हैं। उनके घर के हालात शुरू ही ज्यादा अच्छे नहीं थे। इसलिए बचपन से ही वो अपने पिता की लेबर के काम में ही मदद करते थे। मैट्रिक के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि आगे उन्हें कोई रास्ता नहीं दिख रहा था ना ही घर में कोई गाइड करने वाला था।
उन्होंने सोचा था कोई काम सिखेंगे, जिससे थोड़ी अच्छा कमा सके। इसी दौरान उनका एक्सीडेंट हो गया और वे लंबे अरसे तक बैड रेस्ट पर रहे। उनके लिए पूरे समय बैड पर टाइम निकालना बहुत मुश्किल हो रहा था और वे जिंदगी से निराश होने लगे। उस दौरान उनके एक रिश्तेदार को जब यह पता चला तो वे उन्हें कई पंजाबी उपन्यास और गजल पढ़ने के लिए देकर गए।
उन्हें पढ़ते-पढ़ते वे शायरी लिखने की कोशिश करने लगे, तभी से यह सिलसिला शुरू हुआ। वाहिद ने अपनी बारहवीं और बीए की पढ़ाई प्राइवेट की है। उस दौरान वो संगरूर में आढ़ती की दुकान पर काम करते थे और गजलें और कविता लेखन सीख रहे थे। वाहिद ने बताया कि हर आदमी की लेखन शैली में उसके जीवन के हादसों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है।
वाहिद की किताबें
प्रिज्म चो लंगदा शहर (50 - गजल) - 2015
रंग जो रेनबो च नहीं (कविता)