राष्ट्रपति भवन में होगा बादल-खट्टर का आमना-सामना
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एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ने और राजनीतिक मंचों पर एक-दूसरे का मुकाबला करने के बाद पंजाब और हरियाणा सोमवार को पहली बार राष्ट्रपति के सामने खड़े होंगे। खास बात यह है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपनी बात रखने के लिए अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही समय, सोमवार 28 नवंबर को शाम 6.15 बजे राष्ट्रपति भवन पहुंचने को कहा है।
यानी, अब तक मीडिया के जरिए बयानबाजी करने वाले दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री पहली बार आमने-सामने खड़े होंगे और राष्ट्रपति के समक्ष खुद को सही साबित करने की पुरजोर कोशिश करेंगे। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल जहां अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ पहुंचेंगे, वहीं हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर आल पार्टी डेलीगेशन को लेकर राष्ट्रपति से मुलाकात करेंगे। दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद राष्ट्रपति से मिलने के लिए समय मांगा था।
मुख्यमंत्री बादल के राष्ट्रीय मामलों व मीडिया सलाहकार हरचरन सिंह बैंस ने बताया कि मुख्यमंत्री इस मुलाकात के दौरान इस बात पर जोर देंगे कि नदी जल का यह मामला उसी रिपेरियन सिद्धांतों के अनुसार सुलझाया जाए, जिसके तहत देश में ऐसे मसले हल किये गये हैं। मुख्यमंत्री बादल के साथ उनके मंत्रिमंडल के सभी सदस्य होंगे।
सोमवार शाम 6.15 बजे बादल पहुंचेंगे मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ
कैबिनेट की बैठक
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बैंस ने बताया कि मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति से मांग करेंगे कि पंजाब के देश के संविधान अनुसार बनते पानी के हक की रक्षा विश्वसनीय बनाई जाए। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान केन्द्र सरकार को ऐसा कोई अधिकार नहीं देता कि वह नदी जल के मुद्दे पर कोई फैसला करे और यह कार्य केवल संविधान अनुसार गठित ट्रिब्यूनल द्वारा केवल रिपेरियन राज्यों के बीच ही पानियों की हिस्सेदारी तय कर सकता है। उन्होंने कहा कि हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली सतलुज, रावी और ब्यास नदियों के मद्देनजर गैर रिपेरियन राज्य हैं।
दूसरी ओर, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई में प्रदेश का सर्वदलीय दल राष्ट्रपति से मिलेगा और एसवाईएल नहर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए निर्णय को लागू करवाने के लिए आग्रह करेगा। मुख्यमंत्री खट्टर से साथ राष्ट्रपति भवन पहुंचने वाले डेलीगेशन में हरियाणा के शिक्षामंत्री राम बिलास शर्मा, वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु, स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर, कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, इंडियन नेशनल लोकदल के अध्यक्ष अशोक अरोड़ा, विधानसभा में विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला, शिरोमणि अकाली दल के राज्य अध्यक्ष शरणजीत सिंह सोथा, विधायक शिरोमणी अकाली दल बलकौर सिंह, बहुजन समाज पार्टी के राज्य अध्यक्ष नरेश सरण, विधायक बहुजन समाज पार्टी टेक चन्द शर्मा, निर्दलीय विधायक जय प्रकाश और हरियाणा के महाधिवक्ता बलदेव राज महाजन शामिल होंगे।
यह है पंजाब का पक्ष
SYL पर सीएम बादल का बड़ा एलान
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यह है पंजाब का पक्ष
पंजाब सरकार का दावा है कि वह रिपेरियन राज्य है और राज्य में उपलब्ध संसाधनों पर उसका एकछत्र हक है। पंजाब का यह भी कहना है कि पंजाब के मामले में न तो सतलुज और न ही ब्यास हरियाणा और राजस्थान में से बहती है, इसलिए इन राज्यों का पंजाब के पानी पर कोई हक ही नहीं बनता।
पंजाब सरकार का कहना है कि 1955 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री गुलजारी लाल नंदा की अध्यक्षता में 1955 में हुई बैठक में रावी, ब्यास के अतिरिक्त पानी में से पंजाब (5.9 एमएएफ), पैप्सू (1.3 एमएएफ), जेएंडके (0.65 एमएएफ) और राजस्थान (8 एमएएफ) को पानी देने का फैसला हुआ था। इस तरह रिपेरियन सिद्धांत का खुला उल्लंघन हुआ क्योंकि राजस्थान रिपेरियन राज्य नहीं था। फिर भी राजस्थान को इतना पानी दे दिया गया, जो बाकी तीन राज्यों को दिए पानी से कहीं अधिक था। 1966 में हरियाणा के गठन के बाद पैप्सू सहित पंजाब के पानी में से 50 फीसदी (3.5 एमएएफ) पानी हरियाणा को दे दिया गया। पंजाब का दावा है कि हरियाणा को दी गई पानी की मात्रा यह मात्रा 1955 में पंजाब को अलाट की गई थी। इसलिए हरियाणा को अब तक दिया गया पानी भी पंजाब के हिस्से का ही है।
यह है हरियाणा का पक्ष
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यह है हरियाणा का पक्ष
रावी-ब्यास के आवंटित 3.5 एमएएफ पानी लानी के लिए एसवाईएल नहर की परियोजना 1968 में तैयार हुई थी। भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (बीबीएमबी) ने नवंबर 1979 में अपनी 85वीं बैठक में हरियाणा को रावी-ब्यास का 3.5 एमएएफ पानी नंगल डैम पर आवंटित कर दिया था, लेकिन हरियाणा बीएमएल के जरिए उसमें से केवल 1.62 एमएएफ पानी ही अपने क्षेत्र में ला सका।
अपने हिस्से के पानी को हरियाणा में लाने के लिए राज्य सरकार ने 1980 में अपने हिस्से की करीब 91 किलोमीटर लंबी नहर भी बनाकर तैयार कर ली, लेकिन पंजाब ने इस मार्ग में रोड़ा अटका दिया। नहर की कुल लंबाई 214 किलोमीटर है। पंजाब ने पहले तो अपने क्षेत्र में नहर का निर्माण नहीं कराया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के दवाब के बाद जो नहर बनाई गई, उसे इस साल जुलाई में मिट्टी से भर दिया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश जारी करने के बाद पिछले माह एसवाईएल पर हरियाणा के पक्ष में फैसला भी दे दिया, लेकिन पंजाब सरकार ने एसवाईएल नहर के लिए भूमि का अधिग्रहण रद कर किसानों को उनकी जमीन लौटा दी है। पंजाब सरकार के इस फैसले को हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और एसवाईएल के लिए अधिग्रहित जमीन भूस्वामियों को वापस देने के पंजाब के प्रस्ताव पर हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि कोर्ट तत्काल जमीन की सुरक्षा के लिए रिसीवर नियुक्त करे।