पंजाब सरकार की ओर से सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) को लेकर बुधवार को विधानसभा में पारित किए गए प्रस्ताव कानून की नजर में पूरी तरह बेमानी हैं। इनका कोई आधार नहीं है और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले ही फैसला भी दे चुका है। यह बात वीरवार को हरियाणा के महाधिवक्ता बलदेव राज महाजन ने कही।
उन्होंने कहा कि पंजाब विधानसभा की ओर से एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बावजूद उसके विपरीत जाकर प्रस्ताव पारित अदालत की अवमानना है। महाधिवक्ता ने कहा कि हरियाणा सरकार की ओर से इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया है और उस पर सुनवाई अगले सोमवार को होगी।
यह पूछे जाने पर कि पंजाब ने 1873 में पड़ोसी रियासतों को पानी दिए जाने के एवज में पैसा लिए जाने का हवाला देते हुए विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया है कि वह हरियाणा, राजस्थान व दिल्ली से अब तक दिए पानी का पैसा वसूलेगा।
इस पर महाधिवक्ता ने कहा कि पंजाब सरकार ने देश का संविधान बनने से पहले के उदाहरणों पर प्रस्ताव बना लिया, जबकि स्वतंत्र भारत का संविधान बनने के बाद 1955 में नए कानून लागू हो गए थे। उन्होंने कहा कि एसवाईएल के मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जो समझौता लागू किया था, पंजाब सरकार की ओर से पारित किया गया प्रस्ताव उसके समक्ष नहीं ठहरता।
उन्होंने पंजाब सरकार के उस वक्तव्य को भी गलत बताया कि विधानसभा की ओर से जारी किए गए निर्देश सर्वोपरि हैं। महाधिवक्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह विधानसभा को भी निर्देश जारी कर सकता है। उन्होंने कहा कि एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब विधानसभा द्वारा पारित किए गए एक्ट को असंवैधानिक करार देते हुए रद किया है।
विस में पारित प्रस्ताव को बताया सुप्रीम कोर्ट की अवमानना
सतलुज यमुना लिंक नहर
- फोटो : फाइल फोटो
इससे पहले, वीरवार को हरियाणा सरकार की ओर से एसवाईएल के मुद्दे पर पंजाब सरकार के रुख पर बुलाई गए सर्वदलीय बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए महाधिवक्ता बलदेव राज महाजन ने कहा कि पंजाब सरकार की ओर से लगातार लिए जा रहे असंवैधानिक फैसलों से हरियाणा का कानूनी पक्ष मजबूत हो रहा है।
उन्होंने कहा कि पंजाब के फैसलों की जानकारी हरियाणा सरकार सुप्रीम कोर्ट में देगी। उन्हें अवमानना के रूप में इस्तेमाल करेंगे। हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में 2002 का फैसला लागू कराने के लिए याचिका दाखिल की है, जिसकी सुनवाई सोमवार को होगी। तभी हरियाणा की ओर से पंजाब विधानसभा में पारित प्रस्तावों से भी सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया जाएगा।
उन्होंने बताया कि 1981 में हरियाणा और पंजाब समेत विभिन्न राज्यों के बीच जल बंटवारे का समझौता हुआ था। इसके आधार पर हरियाणा के हिस्से में साढ़े तीन मिलियन एकड़ फुट पानी आया था। 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब को हरियाणा का पानी देने तथा एक साल के भीतर एसवाईएल नहर का निर्माण पूरा कराने के निर्देश दिए थे।
यह फैसला आज भी कायम है। महाजन ने कहा कि यह भी जरूरी नहीं कि सुप्रीम कोर्ट की ताजा राय पर राष्ट्रपति की स्वीकृति का इंतजार किया जाए। मूल निर्णय को सुप्रीम कोर्ट अपने स्तर पर भी लागू करा सकता है। ऐसा कावेरी जल विवाद पर आए निर्णय को लागू कराने के लिए किया गया है।
उन्होंने साफ किया कि पंजाब सरकार के अधिगृहीत जमीनें डी-नोटिफाई करने के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव और डीजीपी समेत जिन सक्षम अधिकारियों को पूर्व में यथास्थिति बनाने यानी रिसीवर नियुक्त करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। प्रदेश में अगर अराजकता की स्थिति बनती है तो उसके लिए संबंधित प्राधिकारी ही जिम्मेदार होंगे।