सुखना लेक के नजदीक बनने वाले टाटा हाउसिंग प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी देने से इंकार कर दिया है। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को अपने आदेश में कहा कि यह प्रोजेक्ट नियमों के अनुरूप नहीं है। यह क्षेत्र सूखना कैचमेंट के अंतर्गत है। राज्य प्रशासन ने जन विश्वास के सिद्धांत का उल्लंघन किया है।
इसके साथ ही पीठ ने करीब 53 एकड़ क्षेत्र में विकसित किए जाने वाले इस प्रोजेक्ट को मिले तमाम प्रशासनिक क्लीयरेंस को खत्म कर दिया है। इससे पहले साल 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस प्रोजेक्ट की मंजूरी देने से मना कर दिया था। टाटा हाउसिंग का यह प्रोजेक्ट 1800 करोड़ रुपये का है, जिसमें 19 टावर में 92,100 फ्लैट बनने थे।
चंडीगढ़ कैपिटल कांप्लेक्स के निकट 53.39 एकड़ जमीन पर बनने वाले सभी टावर 12 से 25 मंजिल के बीच बनने थे। यह प्रोजेक्ट सुखना वाइल्ड लाइफ सेंचुरी से महज 125 मीटर और सुखना लेक से 183 मीटर की दूरी पर था। यह विवाद काफी चर्चित और पुराना है।
प्रोजेक्ट से चंडीगढ़ के स्वरूप को खतरा
विवाद की शुरुआत तब हुई जब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस एजी मसीह पर आधारित खंडपीठ ने 14 मार्च 2011 को आदेश जारी किए थे कि सुखना के कैचमेंट इलाके में किसी भी प्रकार की हाउसिंग कालोनी या भवन निर्माण नहीं होगा लेकिन इस फैसले को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक बार फिर पुनर्विचार की अपील की गई।
इसके बाद अगस्त 2013 में चीफ जस्टिस संजय किशन कौल एवं जस्टिस एजी मसीह पर आधारित खंडपीठ ने कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट संजीव सूरी द्वारा हाईकोर्ट में प्रोजेक्ट क्लीयरेंस संबंधी एफिडेविट को देखने के बाद प्रोजेक्ट पर लगी रोक हटाने के निर्देश जारी कर दिए। इसके बाद सरीन मेमोरियल लीगल एड फाउंडेशन और शहर के ही एडवोकेट आलोक जग्गा ने भी सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी।
साथ ही आरोप लगाया गया कि प्रोजेक्ट का फायदा पाने वालों में हाईकोर्ट के जजों के अलावा राज्य के शीर्ष अफसर भी शामिल हैं, जिसके बाद याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट को ट्रांसफर की गई थी। याचिका में कहा गया था कि इस प्रोजेक्ट से चंडीगढ़ के स्वरूप को खतरा है। सुखना लेक, शिवालिक रेंज और सुखना वाइल्ड लाइफ सेंचुरी पर असर पड़ेगा।
पंजाब व हरियाणा के कई दिग्गज नेताओं का लगा था पैसा
तत्कालीन प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, टाटा कैमलॉट प्रोजेक्ट में पंजाब व हरियाणा के कई दिग्गज नेताओं का पैसा लगा था, जिसके चलते समय-समय पर इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिए जाने को लेकर राजनीतिक दबाव बनाया जाता रहा। कई पूर्व सांसद, एमएलए और आईएएस अधिकारियों को इस प्रोजेक्ट को पास करवाए जाने को लेकर फ्री में फ्लैट भी देने के वादे किए गए थे।