चंडीगढ़ की शान सुखना लेक के दर्द की बस यही कहानी, वीड गाद गंदगी कम बारिश और उड़ता पानी। और भी कई खतरे बढ़ रहे हैं, जिन्होंने खतरा बढ़ाया है। उत्तर भारत की सबसे कम बारिश इस बार चंडीगढ़ में हुई है। इसका सीधा असर सुखना पर पड़ा है और यह सूख रही है। कई तरह की अवांछित जलीय बूटियां तेजी से सतह पर फैल रही हैं।
इनमें नाजस मैरिना और सफेद कमल में तो जैसे झील की सतह पर कब्जा जमाने की होड़ लगी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सतह पर इनका फैलना सुखना की सेहत के लिए सही नहीं है। पांच साल से झील की गाद भी नहीं निकाली गई है। लेक की जलसंग्रहण क्षमता और आकार इससे प्रभावित हो रहा है। आसपास के आवासीय इलाकों से दूषित पानी के लेक में आने की बातें भी कही गई हैं।
संकट की गंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खुद इस पर संज्ञान लिया है। सुखना को बचाने के लिए कई तरह के सुझाव भी दिए जा रहे हैं। प्रशासन कहां सुस्त रहा जो यह संकट गंभीर होता गया, अब क्या-क्या कदम उठाए जा रहे हैं और इसका हल क्या है, इसी पर फोकस है यह विशेष रिपोर्ट...
जलीय बूटियां निकालने में असफल
चंडीगढ़ की शान सुखना लेक
- फोटो : अमर उजाला
सुखना में कई तरह की जलीय बूटियां हैं। इनमें से कंटीली नाजस मरीना वर्ष 2007 से सुखना के लिए संकट बनी हुई है। बोटिंग एरिया से लेकर किनारों तक यह बूटी झील में देखी जा सकती है।
सतह पर आकर यह तेजी से फैलती है और झील के ईको बैलेंस के लिए खतरा बनती है। वैसे भी यह भारतीय वीड नहीं है। हर साल लेबर लगाकर इसे निकालने की कोशिश की जाती है, मगर कोई स्थाई समाधान नहीं निकाला गया है।
इस साल रेगुलेटरी एंड की तरफ सफेद कमल ने झील के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया है। इसने पानी की सतह को पूरी तरह ढक लिया है। इसे निकालने के लिए भी श्रमिकों का सहारा लिया जा रहा है।
वीड को हटाने के लिए मशीन लाने पर हुआ था विचार
चंडीगढ़ की शान सुखना लेक
कुछ साल पहले वीड को हटाने के लिए मशीन लाने पर विचार किया गया था। उस दौरान फारेस्ट डिपार्टमेंट व चंडीगढ़ प्रशासन के अधिकारी डक झील की मशीन को देखने के लिए तीन दिन के दौरे पर भी गए थे।
मशीन की कीमत करीब पांच करोड़ बताई गई थी। इसके अलावा उसका मेंटीनेंस खर्च भी काफी अधिक था। कुछ विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि सुखना लेक के लिए मशीन का लाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि वह काफी महंगी पड़ेगी।
डलझील में इसका इस्तेमाल हो रहा है। वह बड़ी है और प्राकृतिक है। इसके लिए मशीन उपयोगिता मानी जा सकती है। उस वक्त यह भी बताया गया था कि शायद मेंटीनेंस को लेकर विभागों के बीच सहमति नहीं बन पाई थी।
दूषित पानी
चंडीगढ़ की शान सुखना लेक
- फोटो : अमर उजाला
पीयू के बॉटनी विभाग के प्रोफेसर एएस आहलुवालिया व डा. एमसी सिद्धू के अनुसार सुखना में कंटीली नाजस मैरिना का इतनी तेजी से फैलना झील में दूषित पानी, खासकर सीवरेज का पानी आने का संकेत है। इसे तेजी से बढ़ने के लिए दूषित पानी से ही पोषक तत्व मिलते हैं।
यह देखा भी गया है कि कांसल चो और सुखना चो के अलावा कैंपवाला की आवासीय इलाकों से होकर पानी का एक रास्ता लेक तक आता है। हालांकि प्रशासन अब इस रोकने का दावा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पानी का स्तर और नीचे आया तो जलीय बूटी तेजी से बढ़ेगी।
जैसे ही वह धूप के संपर्क में आएगी तो उसका विस्तार तेजी से होगा। जनवरी व फरवरी के आसपास इसे रोक पाना मुश्किल होगा। अभी कुछ जगहों पर पानी वीड के बराबर या ऊपर है। जैसे-जैसे पानी नीचे आएगा वीड बढ़ती जाएगी।
कांसल का सीवरेज पानी
चंडीगढ़ की शान सुखना लेक
कांसल गांव का सीवरेज का पानी रॉकगार्डन के रास्ते सुखना में पहुंच रहा है। इससे सुखना का पानी दूषित हो रहा है। इसके लिए यूटी प्रशासन ने कई बार मुद्दा उठाया, लेकिन अब तक इस पर लगाम नहीं लग पाई है।
यूटी प्रशासन ने पिछले दिनों पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में भी यह मुद्दा उठाया था। अदालत ने इस पर पंजाब सरकार को निर्देश दिए थे कि कांसल के सीवरेज के पानी को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
पानी आने के रास्ते रुके
सुखना चो और कांसल चो की भी नियमित सफाई न होने से इनमें भी पौधे और झाड़ियां उग आती हैं। ऐसे में ये कैचमेंट एरिया के पानी को डायवर्ट कर देती हैं या उसके रास्ते में रुकावट बनते हैं।
यदि 15 से 20 एमएम बारिश होती है तो उसका पानी सुखना तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। ऐसे ही कुछ हालात कैचमेंट एरिया में है। कैचमेंट एरिया में चंडीगढ़ प्रशासन ने 150 के आसपास चेकडैम बनाए हैं।
बिगड़ता इको बैलेंस
चंडीगढ़ की शान सुखना लेक
- फोटो : अमर उजाला
जलीय बूटी की वजह से सुखना का इको बैलेंस बिगड़ रहा है। वैज्ञानिकों पाया कि जहां-जहां नाजस मैरिना है, वहां पर दूसरी कोई बूटी नहीं है। यहां तक शैवाल भी नहीं मिले। इससे पता चलता है कि नाजस मैरिना किसी दूसरी वीड को पनपने भी नहीं देता।
वीड को मछली भी नहीं खा रही हैं। इससे उनके लिए भी दिक्कते भी बढ़ेगी। विशेषज्ञों ने बताया कि वीड को निकालने का सही समय मई व जून का महीना था, लेकिन चंडीगढ़ प्रशासन ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया।
गिरता जलस्तर सबसे बड़ा खतरा
सुखना लेक का सबसे बड़ा खतरा लगातार गिर रहा जलस्तर है। सुखना के पानी का मुख्य स्रोत कांसल और सुखना चो हैं। इनमें सिर्फ नेपली और कांसल के बीच कैचमेंट एरिया से बरसात का पानी आता है।
रविवार को सुखना का जलस्तर 1154 फीट पानी था, जबकि सामान्य जलस्तर 1157-58 फीट होना चाहिए। जब पानी 1160 फीट के आसपास होता है तो माना जाता है कि सुखना का जलस्तर काफी अच्छा है।
गाद की परेशानी
चंडीगढ़ की शान सुखना लेक
- फोटो : अमर उजाला
चंडीगढ़ प्रशासन से जुड़े अधिकारियों ने बताया है कि साल 2011-12 के आसपास गाद निकालने का काम शुरू हुआ था। उस दौरान एक करोड़ आठ लाख क्यूबिक फीट गाद निकाली गई थी। उसके बाद से गाद नहीं निकाली गई है। हालांकि चेकडैम के बाद से सुखना में गाद का आना कम हुआ है।
कम बारिश
लगातार दूसरे साल चंडीगढ़ और इसके आसपास कम बारिश हुई है। पिछले साल 43 फीसदी बारिश कम हुई थी। इस साल भी 42 फीसदी कम बारिश रिकार्ड की गई है।
मौसम विभाग के मुताबिक एक जून से लेकर तीन सितंबर तक 710.4 एमएम बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन अब तक सिर्फ 414.8 एमएम बारिश हुई है। मानसून जाने में करीब 15-20 दिन का और वक्त बचा है। मौसम विभाग कहता है कि अब बारिश होने की संभावना कम है।