फैशन डिजाइनिंग कर रही ट्रांसजेंडर शहबाज कहती हैं कि पहचान हमेशा खुद के दम पर बनानी चाहिए, तभी तो नाम चमकता है। शहबाज ने बताया कि फैशन में अपना एक ब्रांड शुरू करना है, क्योंकि जब भी पहचान बनानी हो तो खुद की बनानी है। इससे पहले बैचलर ऑफ साइकोलॉजी की पढ़ाई की थी। लेकिन वह जीवन में कुछ अलग करना चाहती हैं, इसलिए फैशन डिजाइनिंग में दाखिला लिया। उन्होंने कहा कि भविष्य में उनकी योजना खुद का ब्रांड बनाकर सभी के लिए कपड़े बनाना है। एक दिन ऐसा आएगा कि मेरे बनाए ब्रांडेड कपड़े लोग पहनेंगे।
शहबाज अभी फैशन डिजाइनिंग के दूसरे साल में पढ़ाई कर रही हैं। उन्होंने बताया कि यहां तक का उनका सफर बड़ा उतार-चढ़ाव वाला रहा है। परिवार की ओर से कोई भी सहयोग नहीं रहा, लेकिन उनके दादा ने मरने से पहले एक वसीयत में लिखा था कि जब तक वह पढ़ाई करना चाहती है तब तक वह पढ़ाई कर सकती है और इसके लिए परिवार उसे खर्च देगा। इस पर उन्होंने खुद के खर्च के लिए बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाना शुरू किया था, जिससे समाज में अपने लिए इज्जत बढ़ती देखकर बहुत ही अच्छा लगता है।
एंट्रेस टेस्ट में प्रथम आई तो लगा जैसे सारा जहां मिल गया
शहबाज ने बताया कि फैशन डिजाइनिंग में उनकी दिलचस्पी 13 साल की उम्र से हुई थी, उस समय अपनी पसंदीदा मैगजीन के लिए रुपये जोड़कर वह पढ़ी। इसके बाद इसकी पढ़ाई करने का मन हुआ तो निफ्ट मोहाली का एंट्रेंस टेस्ट दिया, जिसमें प्रथम स्थान हासिल किया था, तब उसे लगा कि सारा जहां मिल गया है।
पीजी में रहती हैं शहबाज
शहबाज ने बताया कि वह पीजी में रहती हैं। कई बार लोगों ने उन्हें ठेस पहुंचाने वाली बातें कहीं, लेकिन अब लोग सहयोग देने लगे हैं। परिवार हर माह खर्च के लिए रुपये तो भेज देता है, लेकिन उतना सहयोग नहीं देता है।
शाइस्ता ने शौक को रोजगार में बदला, अब चल रहे कई घर
मलोया में रहने वाली 23 वर्षीय शाइस्ता ने अपने शौक को रोजगार में बदल दिया। उनके आर्ट क्राफ्ट के हजारों लोग दीवाने हैं। वह खाली बोतल पर आर्ट वर्क और एंब्रायडरी हूप बनाती हैं। शाइस्ता शगुन स्वयं सहायता समूह भी चला रही हैं, जिसमें कई युवतियों को रोजगार मिला है।
शाइस्ता ने बताया कि वर्ष 2016 में जब वह स्नातक कर रही थीं तो उन्होंने यह दस सदस्यीय स्वयं सहायता समूह बनाया था। उस समय सिर्फ एक ही मकसद था कि सभी महिलाएं हर महीने 100 रुपये जमा करेंगी, जिससे हर महीने 1000 रुपये जमा होंगे। कई साल तक ऐसे ही चला रहा। वर्ष 2020 में कोरोना की वजह से लॉकडाउन लग गया। वह एक दिन छत पर टहल रही थीं तो उन्होंने खाली शीशे की बोतल देखी। उन्हें शुरू से आर्ट क्राफ्ट का शौक था। पेंटिंग भी करती थीं, तो उन्होंने उस बोतल को डेकोरेट किया। फिर उसकी फोटो इंस्टाग्राम पर डाली। उन्हें उम्मीद नहीं थी लेकिन उनके इस आर्ट वर्क को लोगों ने काफी पसंद किया, जिससे हौसला मिला और फिर वह अलग-अलग बॉटल्स पर आर्ट वर्क करने लगीं। फिर अपने स्वयं सहायता समूह की अन्य युवतियों को भी इसमें शामिल किया। इसके बाद एंब्रॉयडरी हूप भी बनाए। पहले यह सिर्फ ऑनलाइन बेचे।
नगर निगम ने कराई ट्रेनिंग, काम की क्वालिटी हुई अच्छी
शाइस्ता ने बताया कि नगर निगम ने उनके स्वयं सहायता समूह की ट्रेनिंग कराई। इससे उनके काम की गुणवत्ता काफी अच्छी हो गई। उन्हें नगर निगम की तरफ से प्रदर्शनी में स्टॉल लगाने का मौका मिला। रोज फेस्टिवल, तीज जैसे कार्यक्रमों में उन्होंने अपने उत्पाद प्रदर्शित किए, जिससे बिक्री बढ़ी। लोगों ने पहचाना शुरू कर दिया। संपर्क बढ़े। उन्होंने बताया कि वह अपने बोतल आर्टवर्क को 100 रुपये से 1000 रुपये में बेचती हैं जबकि एंब्रॉयडरी हूप को 1500 रुपये से 4000 रुपये तक में बेचती हैं। कहा कि कई बड़े-बड़े आर्डर भी उन्होंने किए हैं। अब मकसद है कि इस सेल्फ हेल्प ग्रुप को और आगे ले जाया जाए। कहा कि बहुत सी महिलाएं हैं, जो बहुत टैलेंटेड है लेकिन घर में रहने की वजह से काम नहीं कर पा रही हैं। उनकी कोशिश है कि ऐसी महिलाओं को घर में ही काम दिया जाए ताकि उनके टैलेंट का अच्छे से इस्तेमाल हो सके और वह कुछ कमा भी सकें।