इन सुधारों में सब्सिडी वितरण हेतु ‘प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण’ (डीबीटी) की प्रणाली का प्रयोग, विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) की वैधता, लागत आधारित दर, विद्युत अनुबंध प्रवर्तन प्राधिकरण की स्थापना और नियामकीय व्यवस्था को मजबूत बनाना आदि प्रमुख हैं। साथ ही इस मसौदे में विद्युत अधिनियम के प्रावधानों और आयोग के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु अधिनियम में जुर्माने से जुड़ी धाराओं में आवश्यक संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।
हर साल 7400 करोड़ की सब्सिडी लेते हैं हरियाणा के कृषि उपभोक्ता
बिजली सब्सिडी के रूप में देश के सभी राज्य सरकारों को करीब 80 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक भार उठाना पड़ता है। हरियाणा में भी कृषि क्षेत्र के लिए सब्सिडी का यह आंकड़ा 7400 करोड़ के आसपास है। कृषि क्षेत्र के लिए सबसे ज्यादा सब्सिडी दी जाती है। मगर वर्तमान स्थिति देखी जाए तो कृषि में विद्युत सब्सिडी के कारण राज्य सरकारों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है।
यह आर्थिक दबाव विद्युत क्षेत्र के विकास की सबसे बड़ी बाधा रही है। साथ ही वितरक कंपनियों को समय पर भुगतान न मिलने के कारण कंपनियों की स्थिति खराब हुई है। बेहतर तकनीक एवं उपकरणों के नवीनीकरण के न होने के कारण उत्पादन केंद्रों से उपभोक्ताओं तक विद्युत वितरण के दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा की हानि एक बड़ी समस्या है।
इसी वजह से राज्य सरकारें क्रॉस सब्सिडी का सहारा लेती हैं। सरकार पर सब्सिडी के दबाव को कम करने के लिये क्रॉस सब्सिडी जैसी नीतियों को अपनाने से औद्योगिक क्षेत्र पर नकारात्मक परिणाम देखने को पड़ता हैं। इसलिए सरकार कई बड़े सुधार करना चाहती है। जिससे किसान उद्योगपति व अन्य वर्ग के बिजली भुगतान सुचारु और सस्ती बिजली हासिल कर सकें।
सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, नियामक विद्युत उत्पादन और उसके वितरण की लागत के आधार पर विद्युत दरों का निर्धारण करेंगे। नियामकों द्वारा निर्धारित दरों में सब्सिडी को शामिल नहीं किया जाएगा। किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से सीधे उनके खाते में सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
केंद्र सरकार की ओर से भेजे गए विद्युत अधिनियम (संशोधन) विधेयक संबंधी ड्राफ्ट पर अवलोकन व अध्ययन किया जा रहा है। हरियाणा इस संदर्भ में अपनी टिप्पणी और सुझाव जल्द ही केंद्र सरकार को भेजेगा। - दीपेंद्र सिंह ढेसी, चेयरमैन हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग