आने वाले सालों में गेहूं और धान के अवशेष (पराली) को यदि तरीके से ठिकाने नहीं लगाया तो साल 2050 तक इससे होने वाले प्रदूषण का स्तर पूरे देश में करीब डेढ़ गुना तक बढ़ जाएगा। मान लीजिए कि यदि इस समय दिल्ली या चंडीगढ़ का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एआईक्यू) करीब 300 है तो 32 सालों में एआईक्यू करीब 450 तक पहुंच जाएगा।
यह दावा पीजीआई के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ और पंजाब यूनिवर्सिटी की एनवायरनमेंट स्टडीज की एक स्टडी ने किया है। स्टडी में शामिल मुख्य शोधकर्ता पीजीआई के एनवायरनमेंट हेल्थ के एडिशनल प्रोफेसर रविंद्रा खैवाल का कहना है कि पॉलिसी मेकर को पराली के निस्तारण के लिए जल्द से जल्द नीति बनानी होगी।
कई ऐसी तकनीक उपलब्ध हैं, जिनसे पराली को जलाने के बजाय उन्हें किसी दूसरे उपयोग में लाया जा सकता है। जैसे कि बिजली के उत्पादन में। साल 2017 में पूरे भारत में करीब 488 मीट्रिक टन पराली उत्पन्न हुई। इसमें करीब 24 फीसदी अवशेषों को खेतों में जलाया गया।
यदि इसका इस्तेमाल बिजली बनाने में किया जाता तो देशभर की कुल बिजली की मांग का दस फीसदी हिस्सा पराली से पूरा किया जा सकता है। 24 फीसदी पराली जलाने से 824 गीगा ग्राम पीएम 2.5, 58 गीगा ग्राम एलिमेंटल कार्बन (ईसी), 239 गीगा ग्राम आर्गेनिक कार्बन, 211 टेराग्राम सीओ2 का उत्सर्जन हुआ। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है पराली जलाने से वायुमंडल में कितना प्रदूषण बढ़ता है।
पराली जलाने से स्वास्थ्य पर क्या असर है
पराली जलाना
विशेषज्ञों के मुताबिक फसलों पर कई लोग पेस्टीसाइड और फर्टिलाइजर का इस्तेमाल करते हैं, जो पराली जलाने के अवशेषों के साथ केमिकल के कण भी हवा में आते हैं। ये भी कण सांस लेने के दौरान शरीर के अंदर जा सकते हैं। इससे सबसे ज्यादा फेफड़े प्रभावित होते हैं।
हाल की कुछ स्टडीज आईं हैं, जो बताती हैं कि इससे कैंसर के भी होने के चांस हैं। सीएसई की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 तक भारत में अस्थमा के 35 मिलियन गंभीर मरीज सामने आ चुके हैं। पीजीआई की एक स्टडी के मुताबिक चंडीगढ़ में बच्चों में अस्थमा की बीमारी दस साल में डबल हो चुकी है। बच्चों की आईक्यू क्षमता भी प्रभावित होती हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है पराली जलाना कितना खतरनाक है।
पराली समस्या तो है मगर यह एक मौका देती है कि हम इसके समाधान के लिए एक ऐसा आइडिया ढूढ़ें जो पर्यावरण फ्रेंडली हो और रोजगार भी दे। पराली से नैनो सिलिका पदार्थ उत्पन्न होता है, जिसका इस्तेमाल कंप्यूटर व मेडिकल डिवाइस बनाने में किया जाता है। पराली नैनो सिलिका का मुख्य स्रोत है।
- डॉ. सुमन मोर, एसोसिएट प्रोफेसर इन्वायरमेंट स्टीज पंजाब यूनिवर्सिटी
stubble burning
किस साल कितनी जली पराली और कितना प्रदूषण उत्पन्न हुआ
प्रदूषण कण 2003-04 (प्रदूषण) 2016-17 2050
पीएम 2.5 630.70 823.36 1193.88
पीएम 10 624.11 811.34 1176.44
एसओ2 24.57 31.97 46.35
सीओ2 132085.94 171373.95 248492.23
सीओ 6617.46 8510.97 12340.90
एनटूओ 56.03 73.36 106.37
(नोट : प्रदूषण का उत्सर्जन गीगा ग्राम में है।)
किस साल कितनी फसल उत्पन्न हुई और उससे कितनी पराली आई
साल कितनी फसल हुई कितनी पराली हुई कितनी जलाई
2010-11 626.87 454.02 107.27
2011-12 658.15 480.37 112.86
2012-13 637.06 472.79 111.90
2013-14 658.14 487.82 115.14
2014-15 649.78 468.54 111.02
2015-16 632.26 462.39 110.05
2016-17 618.97 487.71 116.82
(नोट : फसल मीट्रिक टन में है।)