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फ्रेंडशिप डेः 7 ऐसे दोस्त जिन्होंने दिल की गहराइयों से निभाई दोस्ती, गजब का है जज्बा

Sun, 05 Aug 2018 12:03 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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सांकेतिक तस्वीर
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आज पूरी दुनिया में  फ्रेंडशिप डे का उत्सव मनाया जा रहा है। सभी लोग बचपन की दोस्ती को याद कर रहे हैं। आज हम आपको इस मौके पर ऐसे सात फ्रेंड से मिलाएंगे जो दशकों बाद भी पूरी शिद्दत से अपनी दोस्ती निभा रहे हैं। 
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अकसर लोग सोचते हैं कि जहां तीन-चार वकील एक साथ मिल जाएं तो वह कानून और केसों को लेकर ही बातचीत करते हैं, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं है। हम वकील कम दोस्त ज्यादा हैं और यह दोस्ती आज से नहीं बल्कि 1975-76 से चली आ रही है। तब हम एक साथ कॉलेज में पढ़ते थे। इसके बाद 1985 में वकालत शुरू की तो कुछ दोस्त उसके बाद जुड़े। कॉलेज से साथ रहे कुछ दोस्त तो आज वकालत भी साथ ही कर रहे हैं। उनसे तो करीब 45 साल पुरानी दोस्ती है। यह विचार साझा किए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और सीनियर एडवोकेट अनमोल रत्तन सिद्घू ने।

अगस्त के पहले रविवार को मनाए जाने वाले फ्रेंडशिप डे पर सीनियर एडवोकेट सिद्घू ने बताया कि उनके बहुत से दोस्त हैं और सभी बहुत अजीज हैं। उनके एक खास मित्र थे निर्मल ढिल्लों, आज वह उनके बीच नहीं हैं, लेकिन हर सुख-दुख के मौके पर वह उन्हें याद करते रहते हैं। इसके अलावा उनके दोस्त देवेंद्र सिंह ढींढ हैं, जो फिलहाल अब अमेरिका में रहते हैं। उनसे व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिए बात होती रहती है।
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विकास और विजय गोदरा
इनके अलावा राज कुमार चुग उनके अजीज मित्रों में शामिल हैं। वह भी वकालत के पेशे में हैं तो उनसे मिलना-जुलना लगा रहा है और भी कई मित्र हैं। काम के सिलसिले में अधिक व्यस्त रहते के कारण बेशक दोस्तों से मिलना कम होता है, लेकिन जब भी मिलते हैं तो प्रोफेशन की नहीं सिर्फ घर-परिवार और सुख-दुख की बातें शेयर करते हैं।
वहीं अगर कहीं चार-पांच दोस्त एक साथ मिल जाएं तो फिर पुराने दिनों को याद करते हैं। उनका मानना है कि काम में व्यस्त रहने के बावजूद दिनभर में थोड़ा वक्त दोस्तों के लिए निकालने से दिनभर की थकान मिट जाती है। सिद्घू कहते हैं कि...
दोस्ती वो नहीं जो जान देती है, 
दोस्ती वो भी नहीं जो मुस्कान देती है,
सच्ची दोस्ती तो वो है... 
जो पानी में गिरा हुआ आंसू भी पहचान लेती है।

करियर बनाने केलिए अलग हो गए लेकिन याद आता है मेरा दोस्त
विकास ने बताया कि विजय गोदरा से मैं चंडीगढ़ में मिला। वह मेरा बेस्ट फ्रेंड है। राजस्थान से चंडीगढ़ पढ़ने वह वर्ष 2013 में आया था। मै हरियाणा से आया था। वह डीएवी कालेज से बीए कर रहा था। विजय मुझसे डीएवी कालेज में मिला। वह बहुत अकेला था। मुझे चंडीगढ़ में मेरा दोस्त विजय गोदारा मिला। उसने मेरी पढ़ाई में मदद की। हम पीजी में साथ रहने लगे। मैने बीएड विजय गोदरा केउत्साह बढ़ाने पर की थी। विजय ने बहुत अच्छे अंको से बीए पूरी की। अब विजय गोदारा  कंपटीशन की तैयारी करने कोटा चला गया है। अभी मैं भी  चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहा हूं। 

मुझे मदद की जरूरत होती है तो विजय गोदारा हमेशा इसके लिए तैयार रहता है। उसे कोर्स की अच्छी जानकारी है। आज भी मेरा दोस्त मुझे बहुत याद आता है। विकास ने बताया कि वह जब भी चंडीगढ़ आता है। वह मेरे पास मिलने जरूर आता है। वह मुझे सही तरीके से गाइड करता है। वह मेरा हौसला बढ़ाता है।  विजय गोदारा ने बताया कि  विकास कई बार मुझे मिलने कोटा आया है। हम फोन और व्हाटसअप के जरिए बात कर लेते हैं। मुझे उससे बात करने  में अच्छा लगता है।

एमआर डोगरा और डायरेक्टर जगतराम
45 साल से है अटूट दोस्ती
पीजीआई के डायरेक्टर जगतराम और एडवांस आई सेंटर के एचओडी एमआर डोगरा के बीच करीब 45 साल से दोस्ती है। इस दोस्ती में भरोसा, त्याग और सच्चाई का एक पवित्र संगम है, जो दोनों के रिश्ते को और मजबूत करता है। डायरेक्टर जगतराम ने बताया कि एमबीबीएस की पढ़ाई से लेकर डायरेक्टर बनने के सफर तक डा. एमआर डोगरा का अहम रोल रहा है। हर कदम पर डा. डोगरा ने साथ दिया है। 

एक वक्त पर डा. जगतराम को साउदी अरब जाना था, उसी दौरान उनकी बेटी की शादी तय हो गई। इससे वे असमंजस में आ गए कि विदेश जाएं या बेटी की शादी की तैयारी करें। उन्होंने इस बारे में डा. डोगरा से जिक्र किया। डा. डोगरा ने कहा कि विदेश में जाना करियर के लिए काफी महत्वपूर्ण है और शादी की पूरी तैयारी की जिम्मेदारी वे उठाते हैं। खरीदारी से लेकर सारा इंतजाम डा. डोगरा ने किया। बेटी की शादी से तीन दिन पहले डा. जगतराम लौटे और शादी की भव्य तैयारियां देखकर दंग रह गए। 

डा. जगतराम का डा. डोगरा के प्रति सम्मान का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि जब वे पीजीआई के डायरेक्टर बने तो उन्होंने डा. डोगरा के लिए आई सेंटर की हेडशिप छोड़ दी, जबकि डायरेक्टर बनने के बाद पीजीआई में ऐसी परंपरा नहीं रही है। साल 1973 में शिमला मेडिकल कालेज में दोनों की मुलाकात हुई थी। डा. डोगरा सीनियर थे। उसके बाद पीजीआई में भी दोनों का साथ मिला। 

बाद में एक ही डिपार्टमेंट मिल गया। डा. डोगरा ने बताया कि  दोनों ऐसे परिवेश से आए थे जहां पथरीले रास्तों पर बिना जूतों के स्कूल जाना पड़ता था। हम दोनों एक दूसरे की परेशानियों को अच्छी तरह से समझते थे। सीनियर होने के नाते मेरा फर्ज था कि मैं डा. जगतराम को सही राह दिखाऊं। जो मैं कहता, उसे वे पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ मानते थे। दोस्ती का जो सिलसिला 45 साल पहले शुरू हुआ था, उसे आज भी पूरी शिद्दत और ईमानदारी के साथ दोनों निभाते हैं।

संजय टंडन के आठ दोस्त
आज भी आठों पक्के दोस्त हैं
भाजपा अध्यक्ष टंडन का कहना है कि उनके आठ दोस्त हैं जो उनके हर सुख और दुख के साथ खड़े हैं। आठ दोस्तों के साथ 40 साल से दोस्ती है। शील, रजनीश, विनय, राघवेंद्र, देश दीपक, अजय और कमल आठों के बीच गजब की दोस्ती है। टंडन के मुताबिक विनय उनके साथ स्कूल में पढ़ता था, उसके बाद जब वह विनय के साथ डीएवी कालेज में प्रेप करने के लिए गए तो बाकी छह दोस्त यहां पर ही मिले। उसके बाद सभी आठ दोस्त ग्रेजुएशन करने के लिए सेक्टर-11 के गवर्नमेंट कालेज में गए जहां पर छह दोस्तों ने बीकॉम और दो ने बीए की।

 तब से भी सभी रेगुलर दोस्त हैं। टंडन ने बताया कि व्हाट्सएप पर इन आठ दोस्तों का अनमोल मोती नाम से ग्रुप बना हुआ है, जिनमें सभी आठ दोस्तों की पत्नियां भी जुड़ी हुई हैं। दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि दोस्तों की पत्नियां भी आपस में दोस्त बन गई हैं। महीने में एक बार मिलना तो तय होता है। सुख-दुख में सब एक साथ कंधा मिलाकर खड़े होते हैं। टंडन ने बताया कि कालेज समय में वह सभी दोस्त सर्दी में शिमला चले गए। 

शिमला में जिनके फ्लैट में रहे वहां पर कंबल कम थे। उस कड़ाके की ठंड में सभी दोस्तों ने कम कंबल में काफी मुश्किल से रात गुजारी जो आज तक याद है। इसके अलावा उन्हें याद है कि कालेज में एक दोस्त की दौड़ प्रतियोगिता थी। सभी दोस्तों को लगता था कि वह जीतेगा लेकिन उस दोस्त ने सुबह प्रैक्टिस इतनी कर ली थी वह प्रतियोगिता के दौरान थक गया। वह सभी उस दोस्त का बाहर मैदान में इंतजार कर रहे थे कि वह जीत कर आएगा लेकिन दोस्त मैदान के अंदर से ही दीवार फांद कर भाग गया।

सांकेतिक तस्वीर
घरवालों की नहीं लल्लू और बेदी की बात मानते थे
पूर्व सांसद सत्यपाल जैन के मुताबिक जब वे छठी क्लास में पढ़ते थे तो उस दौरान रविद्र कुमार और राजेद्र सिंह बेदी से दोस्ती हुई। रविंद्र कुमार को लल्लू, मुझे ‘सत्ता’ एवं तीसरे को मात्र ‘बेदी’ कहकर पुकारते थे। तीनों के बीच दोस्ती इतनी गहरी थी कि हमारे साथी शर्तें लगाते थे कि इन तीनों को कभी किसी ने अलग-अलग देखा है। मैं जब दसवीं में था, तो मेरे पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए जिस कारण मेरी स्कूल की पढ़ाई में बाधा आने लगी।

 तब ये दोनों मेरे घर आते और हर संभव मदद करते। हमारे परिवारों को भी हमारी मित्रता के संबंध में मालूम था और यदि कभी कोई घर वालों की बात नहीं मानते तो परिवार वाले हंस कर कहते कि यह हमारी बात नहीं मानेगा, इसे ‘लल्लू’ या ‘बेदी’ से कहलवा दो, तब मानेगा। हम तीनों मित्र हर बात एक दूसरे से सांझी करते थे तथा हर दु:ख सुख में गहरे साथी थे। 

हमारी मित्रता कॉलेज के प्रारंभिक दिनों तक रही, फिर लल्लू वापस उत्तर प्रदेश चले गए, बेदी डॉक्टर बनने पटियाला चले गए और मैं राजनीतिक जीवन में चंडीगढ़ आ गया। अचानक एक दिन हम सब ने इकट्ठा फोटो खिंचवाया कि जीवन में न जाने कौन कहां चला जाए, कम से कम यह फोटो पुराने दिनों की यादें तो ताजा करवाती रहेगी। और आजकल कभी-कभी इस फोटो को देखकर वही करता हूं।

सचिन चौधरी और स्नेहलता
खेल के मैदान में दोस्ती हुई और फिर शादी
मेरी पत्नी ही मेरा प्यार है। पहले वह मेरी फ्रेंड बनी, फिर बेस्ट फ्रेंड और फिर एक दूसरे के साथ शादी के बंधन में बंध गए। यह कहना है सचिन चौधरी का। सचिन और उनकी पत्नी स्नेहलता हैंडबाल के इंटरनेशनल खिलाड़ी और कोच हैं। दोनों ने पहले हैंडबाल से प्यार किया। इसी खेल के कोर्ट में पहले एक दूसरे से पहली बार मिले, फिर एक दूसरे के करीब आए और अब पति पत्नी हैं।

दोनों ही इंटरनेशनल खिलाड़ी बने और अब युवा प्रतिभाओं को तराशने का काम कर रहे हैं। सचिन और स्नेहलता दोनों ने अपने जीवन में खेल की शुरुआत हैंडबाल से की। नेशनल लेवल पर शहर की टीमों को प्रतिनिधित्व किया। एक मैच के दौरान दोनों की मुलाकात हुई। दोनों ने एक दूसरे को कई बार खेल के मैदान पर खेलते देखा। कुछ देर बाद दोनों ने एक दूसरे को जीवन साथी बनाने का फैसला किया। शादी के बाद भी दोनों के बीच रिश्ता एक दोस्त की तरह है।
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रिचा अग्रवाल, ब्यूटी एक्सपर्ट
मेरे पति हैं मेरे बेस्ट फ्रेंड: ऋचा अग्रवाल
दोस्ती। ये शब्द मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत शब्द है। दोस्ती ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। जिंदगी में अच्छी पढ़ाई और सीख मुझे दोस्तों की बदौलत ही मिली। अजमेर में थीं तो हमेशा मस्ती करती थी। स्कूल की पढ़ाई को कभी गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन एक समय था जब स्कूल में मैं पढ़ाई में बिलकुल अच्छी नहीं थी, लेकिन फिर मेरी जिंदगी में 12वीं कक्षा में रितिका आई, जिसने मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उसकी सीख से ही मैंने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मैंने बीएससी में टॉप किया। इसके बाद मेरे पति मनीष अग्रवाल ने मुझे हर पल आत्मविश्वास से जीना सिखाया। हम दोनों 12वीं कक्षा से साथ हैं। उन्होंने मुझे कभी किसी काम के लिए नहीं रोका। हमेशा मुझमें आत्मविश्वास दिखाया है।
- ऋचा अग्रवाल, ब्यूटी एक्सपर्ट
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