मैं कारपेंटर का काम करता था। जिंदगी काफी बढ़िया चल रही थी। 2009 अक्तूबर में अचानक मुझे दिल का दौरा पड़ा।
इसके बाद मुझे अस्पताल ले जाया गया। मैं इलाज से ठीक तो हो गया। लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि अब ज्यादा मेहनत वाला काम मत करना। फिर कारपेंटर का काम बंद करना पड़ा।
घर में बैठकर टीवी देखना ही बस जिंदगी रह गई। लेकिन कुछ समय बीतने के बाद मैं जिंदगी से बोर हो गया। समझ न आए कि आखिर में क्या करूं।
इसी बीच मुझे अपने बचपन का शौक खिलौने बनाने का ध्यान में आया है। मैंने अपने राज्य के सभ्याचार से जुड़े कुछ खिलौने बनाने शुरू कर दिए। जिसे लोगों ने काफी पंसद किया। इसके बाद से यही मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया।
यह कहानी है राज्य के सफल शिल्पकार हरबंस सिंह की। उन्होंने बताया कि गांव समालसर मोगा के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि वह जो भी खिलौने तैयार करते हैं।
उसे केवल लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शनी लगाते हैं। साथ ही अपने सभ्याचार से जोड़ने की कोशिश करते हैं। आज तक अपना कोई भी तैयार किया हुआ मॉडला नहीं बेचा है।
उन्होंने बताया कि घर एवं अपनी दवाइयों का खर्च वह जमीन के ठेके से आने वाले पैसे से चलाते हैं। करीब सवा एकड़ जमीन से उन्हें 60 हजार के करीब सालाना मिल जाते हैं।
बेटे भी उन्हें सहयोग देते हैं। उन्होंने बताया कि उनके इस शौक को पूरा करने में उनके दोस्त और परिवार वालों का सहयोग मिलता है।