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'डायबिटीज से लड़ते-लड़ते बन गया एजूकेटर'

Sun, 13 Jul 2014 10:31 AM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
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डेराबस्सी निवासी अनिल सैनी(24) को 13 साल पहले पता चला कि वह टाइप वन डायबिटीज से पीड़ित हैं। उसे बताया गया जिंदगी के सफर को बढ़ाने के लिए रोज चार बार इंसुलिन लेनी पड़ेगी।
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पीजीआई के इंडोक्रिनोलॉजी डिपार्टमेंट के एसोसिएट प्रो. संजय बडाडा की देखरेख में उसका इलाज चल रहा था। बडाडा व उनकी टीम के दिल छू लेने वाले व्यवहार से वह इलाज के अलावा उनकी ओपीडी में भी आने लगा।

धीरे-धीरे उसने इंसुलिन लगाने के सही तरीके, शुगर व बीपी चेक करना और बीमारी के दौरान उचित खान-पान की अच्छी जानकारी हासिल कर ली।

बच्चों को देने लगे सलाह
अपने दर्द को भुलाने के लिए क्लीनिक में इस बीमारी से पीड़ित छोटे-छोटे बच्चों के साथ वह घुलने लगा। अब तो पीड़ित बच्चों के अभिभावक छोटी-बड़ी दिक्कत पहले अनिल से साझा करते हैं।
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उसकी दिलचस्पी देख डा. बडाडा ने उसे डायबिटीज एजुकेटर का कोर्स करने की सलाह दी। इंदौर से कोर्स करने के बाद वह पीजीआई में मरीजों की मदद करने लगा।

इस बीच पीजीआई में आईसीएमआर का टाइप वन डायबिटीज का एक प्रोजेक्ट आया। इसमें उसे सलेक्ट कर लिया गया और उसे एजुकेटर की नौकरी पर रख लिया गया।

गरीब मरीजों को मुफ्त इंसुलिन
क्लीनिक में जब भी कोई गरीब पीड़ित आता है तो अनिल की कोशिश होती है कि उसे मुफ्त में इंसुलिन की व्यवस्था कराई जाए।

यदि कोई उसकी मदद के लिए रुपये देता है तो वह उन रुपयों से गरीब मरीजों को इंसुलिन दिलवा देते हैं। हर महीने 20-25 मरीजों को वह इंसुलिन दिलवाता है।

अनिल की राह पर हरविंदर
टाइप वन डायबिटीज से पीड़ित 22 वर्षीय हरविंदर भी अनिल की राह पर है। अनिल की तरह वह भी ओपीडी में आता और मरीजों की मदद के साथ डाक्टरों का हाथ बंटा रहा है।

मरीजों का बीपी व शुगर देखना जैसे काम उसके हवाले हैं। फिलहाल उसे नौकरी नहीं मिली है, लेकिन डाक्टरों का कहना है कि जल्द ही उसे भी नौकरी मिल जाएगी।

क्या है टाइप वन डायबिटीज
डॉक्टरों के मुताबिक टाइप वन डायबिटीज होने के सही कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। टाइप वन डायबिटीज बीमारी ऑटो इम्यून डिजीज है। यह बीमारी वायरस, प्रोटीन या मिल्क से हो सकती है।

जब शरीर के अंदर इंसुलिन बनाने वाली सेल्स के खिलाफ एंटीबॉडीज बनने लगती हैं तो इससे शरीर में इंसुलिन बनना बंद हो जाता।

ऐसे में मरीज को सुबह शाम इंसुलिन लेनी पड़ती है। देश में करीब 5 लाख बच्चे टाइप वन डायबिटीज बीमारी के शिकार हैं।

ओपीडी में आने से अनिल का तो कांफिडेंस लेवल बढ़ ही रहा था, साथ ही उन बच्चों में भी आत्मविश्वास की आशा झलक  रही थी, जो अनिल के संपर्क में थे। बीमारी से जूझने के जज्बे और सीखने की ललक देखकर उसे प्रोजेक्ट में सलेक्ट किया गया है।
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डा. संजय बडाडा, एसोसिएट प्रोफेसर, पीजीआई
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