पंजाब की प्रसिद्ध कवयित्री सुखविंदर अमृत ने जब कविताएं लिखी तो मायके में उन्हें पढ़ने से रोका गया। ससुराल ने भी शिक्षा का विरोध किया। अब उनकी कविताएं स्कूल कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती हैं। क्योंकि कला फना नहीं होती, कविता अमर है, कविता नहीं जलती।
अमृत कहती हैं कि दोनों परिवारों में एक ही चूल्हा था जिनमें लकड़ियों के साथ मेरी कविताएं जलती थीं। सेक्टर 16 के पंजाब कला भवन में कवि दरबार में शामिल होने आईं अमृत से अमर उजाला ने खास बात की।
सुखविंदर अमृत ने कहा कि पंजाब के लिए लुधियाना के गांव सदरपुरा के सरकारी स्कूल में नौवीं तक पढ़ाई की। स्कूल के शिक्षक ने कविता देखकर आशीर्वाद दिया। नौवीं में जब पढ़ती थीं तो उसी समय मां का हाथ टूट गया। उसके बाद पढ़ाई छूट गई। उन्होंने कहा कि पढ़ाई छूटने पर ऐसा लगा कि सपने टूट गए। सभी दरवाजे बंद हो गए। अब रोटी बनाने और मार खाकर ही जिंदगी बसर करनी पड़ेगी, रोती थीं और अवसाद में रहने लगीं। उस दौरान अंदर से आवाज आई कि लड़कियों के दो-दो घर होते हैं। मायका और ससुराल।
17 वर्ष की उम्र में शादी हो गई। सोचा कि ससुराल में मेरी पढ़ाई में सहयोग मिलेगा। मेरी मां ने मेरी कविता की कॉपी और पेन चूल्हे में जला दिए थे। मां ने कहा कि पिता को पता चलेगा कि कविता लिखती है तो तुझे मार डालेंगे। मां-बाप से सहयोग नहीं मिला तो लगा कि ससुराल में बेहतर होगा। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि उनकी शादी हो जाए। ससुराल में ही पढ़ूंगी। लेकिन ससुराल वालों में भी वही मानसिकता थी।
ससुराल की दीवार ऊंची कर दी गई
सुखविंदर अमृत ने कहा कि जब शादी हुई तो ससुराल में कहा गया कि ब्याही लड़की स्कूल नहीं जाती। घर का चूल्हा चौका संभालो। कविता जलाने वाला चूल्हा ससुराल में भी था। एक कॉपी मंगवाई, दुख लिखना शुरू किया। ससुराल की दीवारें ऊंची कर दी गईं। बांस की सीढ़ी थी, जिससे छत पर जाते थे। उस सीढ़ी को हटा दिया गया ताकि छत पर न जा पाएं। पहले घर का गेट खुला होता था अब गेट भी बंद हो गया। जेल की जैसी जिंदगी हो गई। इस पर एक कविता लिखी। उन्होंने लिखा कि मैं किसनूं अपना आखां, कि ऐथे कौन है मेरा, मैं कल पेके पराई सी ते अज सौरे पराई है।
पति को कहा-किसी पढ़े लिखे से पूछना पढ़ाई कितना जरूरी है...
सुखविंदर कौर शादी के बाद लुधियाना अपने ससुराल आ गई। 12 वर्ष के बाद पति को मुझ पर विश्वास हुआ और दसवीं में नाम लिखवाया। पति मैकेनिक थे। गरीब की बेटी गरीब की बहु बनी। पति कमाकर लाते उसे जोड़ती रही। बच्चों को पढ़ाया। फिर अपने पति से कहा कि बच्चों की कसम है। आपके गैराज पर कई पढ़े लिखे लोग गाड़ी ठीक करवाने आते हैं। उनसे पूछना और मुझे बताना कि पढ़ाई अच्छी या बुरी। यदि लोग कहेंगे पढ़ाई बुरी है तो फिर कभी पढ़ने के लिए आपसे नहीं बोलूंगी।
पति के पास एक कॉलेज के प्रोफेसर अपनी गाड़ी ठीक कराने आए। उन्हीं से पूछा पढ़ाई क्या होती है। कोई पढ़ना चाहती है। उन्होंने कहा कि पढ़ाई बहुत जरूरी है। पढ़ाई कर ही किताब लिखते हैं, जिसे पढ़कर लोग आगे बढ़ते हैं। उसके बाद पति ने किताब और पेन मंगवाया। दसवीं में नाम लिखवाया। 26 वर्ष की उम्र में 10वीं पास की। दसवीं में 58 प्रतिशत अंक आए। 12वीं में फर्स्ट की। बीए और एमए किया। अब तक नौ किताबें लिखी हैं। दसवीं किताब आने वाली है। मेरे बेटे और बेटी आस्ट्रेलिया में रहते हैं। खुशहाल जिंदगी है। उनकी पुस्तक निलीआ मेरा वे के अंश अकाल यूनिवर्सिटी, हजार रंगां दी लाट लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, धुंध दी चुन्नी सेंट्रल यूनिवर्सिटी हिमाचल प्रदेश और पुनिया गुरुननानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर में पढ़ाई जा रही है।