किसी के अच्छे दिन आए या न आए मेरे बुरे दिन आ गए हैं। यह कहना है कजहेड़ी कालोनी निवासी छोटे लाल का। छोटे लाल और उनकी पत्नी सोना देवी निशक्त हैं। तीन छोटे बच्चे हैं। बेटी निशा पांचवीं में पढ़ती है। बेटा कमल चौथी में और छोटा बेटा बबलू पहली कक्षा में पढ़ता है।
10 मई को चार कालोनियां गिराई गईं थी। इसमें कजहेड़ी कालोनी भी शामिल थी। छोटे लाल की झुग्गी गिरा दी गई। टूटे घर से अपना सामान तक नहीं निकाल पाए। सब कुछ मलबे में दब गया। जो सामान बच गया उसे लोगों ने लूट लिया। दोनों पति पत्नी कुछ भी नहीं कर पाए।
उनके पास वोटर पहचान पत्र, आधार कार्ड भी है। छोटे लाल का कहना है कि झुग्गी टूटने के बाद वे सड़क पर पत्नी और बच्चों के साथ आ गए। बारिश में सेक्टर-52 में बने शेड वाली कालोनी के टूटे शेड में शरण ली। अब पुलिस वाले तंग करते हैं।
मुझे टूटे शेड में भी शरण मिलेगा कि नहीं?
छोटे लाल बताते हैं कि क्या भारत मेरा देश नहीं? क्या इस देश में मरे लिए टूटे शेड में भी शरण नहीं मिलेगी? यह कहकर छोटे लाल फफककर रोने लगते हैं। पड़ोस के रहनेवाले जवाहर लाल और कई महिलाएं समझाने लगती हैं। विकलांगों के लिए आखिर इतनी योजनाएं क्या कर रही हैं। अधिकारी इतना उदासीन रवैया क्यों अपना रहे हैं। वे तो पढ़ लिखे हैं।
केले बेचकर गुजारा
छोटे लाल का कहना है कि वे सेक्टर-41-42 के चौक पर केले बेचकर अपना परिवार चलाते हैं। अब सहा नहीं जाता। आखिर इन छोटे बच्चों को लेकर कहां जाऊं। इस टूटे शेड को छोड़कर कहीं अधिकारियों से मिलने भी जाऊं तो कोई सामान ही लेकर चला जाएगा। इस शेड में बारिश से बचने के लिए रह रहा हूं। अफसरों से मिलने भी कैसे जाऊं। खुद ही कोई बताए जो साधारण रूप से नहीं चल सकता है वह दूसरी और तीसरी मंजिल पर अधिकारियों के पास कैसे चढ़ सकता है। मेरे तो बुरे दिन आ गए हैं।