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साइकिल की सीट बनाते हुए जानकीदास ने खड़ा किया था एटलस का साम्राज्य, चौथी पीढ़ी में लग गया ताला

Sun, 07 Jun 2020 06:15 PM IST
ajay kumar अंकित चौहान, अमर उजाला, सोनीपत (हरियाणा)

सार

  • दुकान में साइकिल की गद्दी बनाते थे राय बहादुर जानकीदास कपूर, 25 एकड़ जमीन मिलने पर छोटी फैक्ट्री लगाई
  • जानकीदास का 1967 में निधन होने पर तीन बेटों में बिशंबर दास ने संभाला काम, उनका फैसला मानते थे दोनों भाई
  • बिशंबर दास के समय में सबसे ज्यादा उठान पर रही एटलस, 2000 में निधन के बाद कुप्रबंधन से बिगड़े हालात
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विस्तार
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एटलस साइकिल की देश के कई जगहों पर चल रही यूनिटों को भले ही धीरे-धीरे बंद कर दिया गया हो। लेकिन एटलस साइकिल कंपनी की शुरुआत राय बहादुर जानकीदास कपूर ने एक दुकान में गद्दी बनाते हुए की थी। राय बहादुर जानकीदास कपूर को देश की आजादी के बाद 25 एकड़ जमीन मिली तो साइकिल की गद्दी बनाते हुए उन्होंने छोटी फैक्ट्री शुरू कर दी।

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वह फैक्ट्री बढ़ती गई तो उनके निधन के बाद बेटों ने काम संभाल लिया। जिस समय जानकीदास के बेटों ने फैक्ट्री को संभाला, वह एटलस का ऊंचाई छूने वाला दौर रहा। उनके निधन के बाद हालात बिगड़ते गए और एक समय में ऊंचाइयां छूने वाली एटलस को चौथी पीढ़ी ने कुप्रबंधन के कारण पूरी तरह से बंद कर दिया।  

एटलस कंपनी के संस्थापक राय बहादुर जानकीदास कपूर सन 1951 से पहले तक एक दुकान में साइकिल की गद्दी बनाते थे। उनको आजादी के बाद सोनीपत में 25 एकड़ जमीन मिली थी, जिस पर जानकीदास कपूर ने साइकिल बनाने की छोटी फैक्ट्री लगाई। जानकीदास खुद साइकिल बनाना जानते थे, इसलिए उनको साइकिल की फैक्ट्री लगाने पर कामयाबी मिलती चली गई। यहां जिस तरह से उत्पादन बढ़ता चला गया, उसी तरह से फैक्ट्री का दायरा बढ़ता गया। 

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एटलस के पुराने कर्मचारी रहे सुशील बताते हैं कि इस बीच ही जानकीदास कपूर का 1967 में निधन हो गया। लेकिन उनके तीन बेटों बिशंभर दास कपूर, जयदेव कपूर व जगदीश कपूर ने मिलकर फैक्ट्री को संभालना शुरू कर दिया। फैक्ट्री की पूरी जिम्मेदारी बिशंभर दास उठाते रहे और जयदेव व जगदीश उनका साथ देते रहे। एटलस का 1967 के बाद का दौर ऊंचाइयों को छूने वाला रहा और एटलस की मुख्य यूनिट के साथ ही सोनीपत में कई यूनिटें शुरू हुईं। 

इसके बाद यहां से धीरे-धीरे लुधियाना (पंजाब), साहिबाबाद (उत्तर प्रदेश), मालनपुर (मध्य प्रदेश) और गुरुग्राम में कई अन्य यूनिटें शुरू कर दी गईं। एटलस का दायरा बढ़ने के बाद भी बैलेंस सीट एक ही रही और तीनों भाई मिलकर फैक्टरियों को संभालते रहे। जहां बिशंभर दास सोनीपत की मुख्य यूनिट व लुधियाना की यूनिट संभालते थे। वहीं जयदेव कपूर सोनीपत की मिलटन फैक्ट्री व साहिबाबाद की यूनिट को संभालते थे। इस तरह ही जगदीश कपूर रसोई गांव की ऑटो फैक्ट्री, मालनपुर की यूनिट व गुरुग्राम की एटलस ट्यूब मिल को संभालते थे। 

इन तीनों ने एक साथ मिलकर काम किया और एटलस विदेश तक पहुंच गई। एटलस की पूरी जिम्मेदारी उठाने वाले बिशंभर दास कपूर का 2000 में निधन हो गया और उसके बाद ही एटलस का कुप्रबंधन शुरू हो गया, जिससे हालात बिगड़ते चले गए। इसके तीन साल बाद ही मुख्य यूनिट को धीरे-धीरे समेटना शुरू कर दिया गया। 

एटलस के कर्मचारी सुशील के अनुसार बिशंभर दास के बाद उनके बेटे अरुण कपूर, राजीव कपूर व विक्रम कपूर ने सोनीपत की यूनिट को संभालना शुरू किया था। लेकिन उसके कुछ साल बाद ही विक्रम कपूर के बेटे अंगद कपूर ने बाद में यहां बैठना शुरू कर दिया। जानकीदास कपूर की चौथी पीढ़ी अंगद कपूर ने यहां से एटलस को समेटना शुरू कर दिया और उसके बाद इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया। 

इस तरह ही जयदेव कपूर के बेटों गिरीश व गौतम और जगदीश के बेटों संजय कपूर, सलील कपूर व अजय कपूर भी अपने हिस्से की यूनिट को संभालते रहे। सुशील बताते हैं कि इन सभी की बैलेंस सीट एक ही रही और उसका ही असर सभी यूनिट पर पड़ता रहा। एक यूनिट में घाटा हुआ तो अन्य यूनिट तक उसका असर पहुंचा। जबकि कुप्रबंधन का सबसे ज्यादा असर यूनिटों पर पड़ रहा था और उसमें सुधार नहीं हुआ तो हालात लगातार बिगड़ते चले गए। इस तरह जिस एटलस को राय बहादुर जानकीदास व उनके तीनों बेटों ने देश के साथ ही दुनिया भर में पहुंचाया, आज वह गर्त में पहुंच चुकी है और उनकी चौथी पीढ़ी ने सब कुछ बंद कर दिया। 

कर्मचारियों की ग्रेच्युटी नहीं मिली तो पेंशन भी नहीं मिल रही
सोनीपत की मुख्य यूनिट से निकाले गए कर्मचारियों को पहले वेतन तक नहीं दिया जा रहा था लेकिन कर्मचारियों ने धरना-प्रदर्शन करके अपना वेतन निकलवाया। उनको वेतन मिल गया तो किसी की ग्रेच्युटी अभी तक नहीं मिली है और किसी की पेंशन नहीं मिल रही है। पेंशन के फार्म तक नहीं भरवाए जा रहे हैं। इस कारण कर्मचारी कोर्ट में जाने की तैयारी कर चुके हैं। वह कोरोना महामारी कम होते ही कोर्ट का सहारा लेने की बात कहते हैं। 
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नौकरी जाने की पीड़ा पूर्व कर्मचारियों की जुबानी

फैक्ट्री के बंद होने पर मैं बेरोजगार हो गया। मैंने इस फैक्ट्री में 34 साल नौकरी की है। अचानक से फैक्ट्री के बंद होने पर हमें बहुत परेशान होना पड़ा है। अब पेंशन भी नहीं मिल रही है, जिस कारण मुश्किल कम नहीं हुई है। -प्रकाश, पूर्व कर्मचारी।

फैक्ट्री के बंद होने के बाद हम करीब 135 कर्मचारी ऐसे थे, जिनका दो माह का वेतन रोका गया था। अपना वेतन लेने के लिए हमने कई माह तक धरना प्रदर्शन किया। इसके बाद श्रम विभाग में केस डाला गया। तब जाकर फैक्ट्री मालिक ने हमें दो माह का वेतन देने के अतिरिक्त तीन माह का भी वेतन दिया। लेकिन अब हम लोग पेंशन को लेकर परेशान हैं।  बिजेंद्र, पूर्व कर्मचारी।

हम लोगों का ग्रेच्युटी का पैसा भी अभी बकाया है। इसके लिए हम लोग कई बार फैक्ट्री मालिक से मिल चुके हैं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। अब हम लोगों को अपनी ग्रेच्युटी का पैसा लेने के लिए कोर्ट का सहारा लेना पड़ेगा। फिलहाल कोरोना महामारी का प्रकोप चल रहा है, इसके कम होते ही हम सभी कर्मचारी बैठक कर आगे की रणनीति तय करेंगे। - लीलाधर, पूर्व कर्मचारी।

फैक्ट्री के अंदर अभी अकाउंट विभाग में करीब 15 लोग काम कर रहे हैं। लेकिन उन्हें भी अब चार माह से वेतन नहीं मिल रहा है। जिस कारण इन कर्मचारियों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में अब वह लोग दूसरी जगह भी काम नहीं कर पा रहे हैं।  -रमेश, पूर्व कर्मचारी।

फैक्ट्री मालिकों का आपसी विवाद चल रहा है तो प्रबंधन भी सही नहीं था, जिस कारण फैक्ट्री को बंद कर दिया गया है। फैक्ट्री पूरी तरह से बंद हो चुकी है और हम लोग बेरोजगार होकर इधर-उधर भटक रहे हैं।  - लाल बिहारी, पूर्व कर्मचारी।

फैक्ट्री बंद होने के बाद अभी तक हम लोगों के पेंशन के फार्म भी नहीं भरवाए गए हैं। जबकि हम लोग आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। फैक्ट्री अधिकारियों से हम लोग कई बार पेंशन फार्म भरवाने की मांग कर चुके हैं। लेकिन हर बार हमें एक नया बहाना बनाकर टाल दिया जाता है और अब दो माह से लॉकडाउन का बहाना बना रखा है। हालात सामान्य होते ही हम लोग अब कोर्ट का सहारा लेंगे। - रामफल, पूर्व कर्मचारी।
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