चंडीगढ़। समय वह भी था जब हम किसी को खत लिखते और उसके जवाब का लगभग दस पंद्रह दिन इंतजार करते। कई बार ये इंतजार और भी लंबा हो जाता। कभी पत्र के लिए पोस्टकार्ड या लिफाफा लेने के लिए डाकखाना जाती, फिर पत्र पोस्ट करने के लिए भी डाकखाना जाना पड़ता। डाकिए के आने के समय पर घर के दरवाजे, खिड़की से झांकना या फिर किसी खास चिट्ठी का घर के बाहर खड़े होकर इंतजार करना और पत्र न आए तो निराश हो जाना। बहू-बेटियों के नाम कोई पत्र आए तो घर में पूरी खोजबीन टीम बैठ जाती थी। यह कहना है सेवानिवृत अध्यापिका, कवयित्री और लेखिका विमला गुगलानी का।
रंगों से पता चल जाता था खुशी और गम का...
गुगलानी ने कहा कि बेटा पैदा हुआ हो, शादी निश्चित हुई हो तो पोस्ट कार्ड पर हल्का गुलाबी रंग छिटका होता। किसी के देहांत की सूचना होती तो कोने से कार्ड का हल्का सा टुकड़ा कटा होता। किसी खास के लिए पत्र होता तो अतंर्देशीय लिफाफे की तरह बंद हो होता। कोई प्रेमी प्रेमिका होते तो रंगीन फूलों वाले कागज पर लिखकर ऊपर सेंट छिड़कर डाकखाने से मिलने वाले लिफाफे में डालकर अच्छे से बंद करके भेजते। लिफाफे के अंदर कभी-कभी लिपस्टिक के निशान या फिर आंसू से भीगे अक्षर भी मिल जाते।
पिता की चिट्ठी आज तक रखी हैं: शशि कौशिक (निवासी सेक्टर 40)
बात 1980 की है। 14 अगस्त को मेरा बेटा हुआ था। उस समय हाल जानने के लिए पत्र ही माध्यम था। मेरे पिता ने 24 अगस्त 1980 को चिट्ठी लिखी थी। बेटा होने पर आशीर्वाद दिया था। वह सहारनपुर उत्तर प्रदेश में रहते थे। मेरी शादी दिल्ली में हुई थी। पति चंडीगढ़ में जॉब करते थे। उस वक्त सेक्टर-15 में रहते थे। मैं भी चंडीगढ़ आ गई और पीजीआई में नर्सिंग अफसर के रूप में नौकरी करने लगी। अब सेवानिवृत्त हो गई हूं। आज भी उस चिट्ठी को संजो कर रखी हूं। इस चिट्ठी में पिता का दुलार है प्यार हैं। अभी भी समय-समय चिट्ठी को पढ़ती हूं। जब से फोन शुरू हुए लोग चिटि्ठयों को भूल गए।