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सामने आया खेमका कार्यकाल का सच

Tue, 08 Jul 2014 05:39 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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रॉबर्ट वाड्रा-डीएलएफ डील की जमीन का म्यूटेशन रद्द करने के बाद चर्चा में आए वरिष्ठ आईएएस अशोक खेमका के कार्यकाल में हरियाणा वेयर हाउसिंग के गोदाम निर्माण में कई खामियां बरती गई थीं। राज्य सरकार द्वारा गोदाम निर्माण के प्रधान महालेखाकार से कराए गए विशेष ऑडिट में यह गड़बड़ियां पाई गई हैं।
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राज्य सरकार ने वेयर हाउसिंग कारपोरेशन को रिपोर्ट सौंपकर टिप्पणी मांगी है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने पहले इस मामले में सीबीआई जांच कराने के प्रस्ताव को मंजूर कर लिया था लेकिन बाद में विशेष ऑडिट कराने का फैसला किया था।

हरियाणा सरकार को मिली रिपोर्ट

आरटीआई कार्यकर्ता रविंद्र कुमार ने 19 अगस्त 2013 को मुख्यमंत्री से की शिकायत में आरोप लगाया था कि हरियाणा वेयर हाउसिंग कारपोरेशन के एमडी रहते हुए अशोक खेमका ने गोदामों की छत गैलवैल्यूम शीट के साथ बदलने के टेंडर बिना मंजूरी के जारी किए थे। शिकायत में मामले की जांच सीबीआई से कराने का आग्रह किया गया था।

सरकार के निर्देश पर कृषि विभाग के प्रशासनिक सचिव ने 18 नवंबर 2013 को मुख्य सचिव को सौंपी रिपोर्ट में मामले को आर्थिक अपराध से जुड़ा बताते हुए विजिलेंस जांच की सिफारिश की।

बाद में सरकार ने खेमका के कार्यकाल में वेयर हाउसिंग कारपोरेशन में हुए गोदाम निर्माण का विशेष ऑडिट कराने का आग्रह कर लिया। प्रधान महालेखाकार ओंकार नाथ ने यह ऑडिट रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंप दी है।
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ऑडिट में ये पाई खामियां

1. 29 जनवरी, 2009 को फाइनेंशियल बिड खोलने के लिए तय मीटिंग से पहले 28 जनवरी को ही तकनीकी और फाइनेंशियल बिड खोल दी गई। इसके अतिरिक्त 350 और 550 ग्रेड की टेंशाइल स्ट्रैंथ लिए टेंडर मांगे गए थे लेकिन ठेका 350 ग्रेड का ही दिया गया।
2. 18 फरवरी, 2009 को 25 गोदाम बनाने के लिए ठेका दिया गया। मगर उसके बाद 9.52 करोड़ रुपये का ठेका अतिरिक्त गोदाम बनाने के लिए तीन बार दे दिया गया। जबकि इसके लिए ताजे टेंडर जारी किए जाने चाहिए थे।
3. कोरिया की कंपनी की गैलवैल्यूम (डोंग बू ब्रांड) शीट लगाने का ठेका दिया गया। कंपनी विशेष के नाम से शीट का चयन करना टेंडर की शर्तों का उल्लंघन था।
4. ठेके के एवज में रखी गई गोदाम बनाने वाली कंपनी की 1.64 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी राशि समय से पहले जारी की गई। जिससे निगम को 36.92 लाख रुपये का ब्याज का नुकसान हुआ। हालांकि बाद में निगम ने यह राशि वसूल कर ली। कंपनी ने इस फैसले को ऑर्बिट्रेटर के पास चुनौती दी है। साथ ही अन्य कार्यों के बदले 1.70 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी रखी ही नहीं जिससे निगम को 42.08 लाख रुपये का ब्याज का नुकसान हुआ।
5. वर्कर वेलफेयर सेस की राशि नहीं काटी गई। बाद में यह राशि जनवरी, 2014 में 65 लाख रुपये काटी गई। कंपनी ने इस फैसले को भी हाईकोर्ट में चुनौती दे रखी है।

कोट्स
हां, हरियाणा सरकार से विशेष ऑडिट की रिपोर्ट निगम के पास जवाब भेजने के लिए मिली है। रिपोर्ट का आकलन किया जा रहा है।
रमेश कृष्ण, प्रबंध निदेशक, हरियाणा वेयर हाउसिंग कारपोरेशन

राज्य सरकार को अब इस मामले में सीबीआई से केस दर्ज कर जांच शुरू करने का आग्रह करना चाहिए। मैं भी जांच की मांग को लेकर सीबीआई से संपर्क करूंगा।
रविंद्र कुमार, शिकायतकर्ता
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