देश के पहले 20 स्मार्ट शहरों की सूची में आने केलिए 1-1 नंबर कितना कीमती था, चंडीगढ़ से बेहतर इसे और कोई नहीं समझ सकता। स्मार्ट शहरों की सूची में 20वें नंबर पर रहे भोपाल से चंडीगढ़ महज .74 अंक से पिछड़ा है। जबकि चंडीगढ़ प्रशासन ने 10 से अधिक अंक तो अपनी कमी में पहले ही गवा दिए थे। इसमें सिटीजन चार्टर और हाउस टैक्स के 10 अंक सीधे-सीधे शामिल हैं।
सिटीजन चार्टर लागू नहीं कर पाने और कम राजस्व उत्पत्ति ने चंडीगढ़ का देश के पहले 20 स्मार्ट शहरों में शामिल होने का रास्ता रोका। जिस सिटीजन चार्टर को स्मार्ट सिटी प्रस्ताव भेजने से पहले लागू किया जाना था अधिकारियों की लापरवाही की वजह से वह आज तक भी लागू नहीं हो पाया।
राजस्व उत्पत्ति की शर्तों में भी चंडीगढ़ का प्रस्ताव खरा नहीं उतर पाया। टॉप-20 स्मार्ट शहरों से बाहर होने की यह मुख्य वजह रही। हालांकि अभी तक चंडीगढ़ प्रशासन को प्रस्ताव में रही कमियों का पता नहीं चल पाया है। कमियों का पता लगाने इसी सप्ताह गृह सचिव शहरी विकास मंत्रालय जाएंगे।
यहां चूका चंडीगढ़
-हाउस टैक्स लगाना भी गया बेकार
पहले 20 स्मार्ट शहरों में शामिल होने के लिए प्रशासन का हाउस टैक्स लगाने का फैसला भी किसी काम नहीं आया। प्रशासन ने जल्दबाजी में हाउस टैक्स तो लगा दिया लेकिन उसकी शर्तों का ध्यान से अध्ययन नहीं किया। शर्तों में पिछले तीन साल के हाउस टैक्स का विवरण मांगा गया था। जबकि प्रशासन ने हाउस टैक्स कुछ महीने पहले ही लागू किया था। ऐसे में हाउस टैक्स के 5 नंबर कटने स्वाभाविक थे।
-सिटीजन चार्टर के कटे 5 नंबर
स्मार्ट सिटी मिशन में सिटीजन चार्टर को भी पूरा महत्त्व दिया गया था। सिटीजन चार्टर के अलग से 5 नंबर तय किए गए थे। जो सिटीजन चार्टर स्मार्ट सिटी प्रस्ताव भेजने से पहले लागू किया जाना था, वह आज तक अटका हुआ है। लेटलतीफी पर अपनी जवाबदेही से बचने केलिए अधिकारियों ने आज तक इसे लागू नहीं होने दिया। सिटीजन चार्टर लागू हुआ होता तो चंडीगढ़ को सीधे-सीधे 5 अंकों का फायदा होता। स्मार्ट शहरों की सूची में 20वें नंबर पर रहे भोपाल से .74 अंक पीछे रहा चंडीगढ़ टॉप-10 में शामिल होता।
- जलापूर्ति में राजस्व से ज्यादा घाटा
जलापूर्ति पर एकत्र होने वाले राजस्व से कई गुणा अधिक खर्च हो रहा है। एक साल में करीब 60 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है। दूसरे खर्च छोड़कर बात सिर्फ जलापूर्ति के संचालन और रखरखाव की ही करें तो इसका खर्च भी राजस्व से कहीं ज्यादा है। जबकि प्रस्ताव में चौबिसो घंटे बिजली-पानी सप्लाई केलिए वर्तमान समय में राजस्व और खर्च का विवरण भी मांगा गया था।
-जनभागीदारी रही कम
स्मार्ट सिटी को मिशन बनाने केलिए जनभागीदारी सबसे अहम पहलु था। मिशन के तहत कौन-कौन सी गतिविधियां हुई और हर गतिविधि में कितने लोगों से भाग लिया। यह पूरी जानकारी आंकड़ों सहित प्रस्ताव में देनी थी। लेकिन लोगों का रुझान इसमें कम रहा।
कुछ अधिकारियों ने तो अपने एरिया में स्मार्ट सिटी पब्लिक कैंप ही नहीं लगाए। कई बार पहले से प्रस्तावित कैंप रद्द हुए। जिसकेबाद लोगों का प्रशासन के खिलाफ गुस्सा भी फूटा। मेरे सपनों का शहर विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता में लोगों की भागीदारी में चंडीगढ़ भोपाल और फरीदाबाद से भी पिछड़ गया था।
-कंसल्टेंट ने भी बीच में छोड़ा साथ
करीब एक महीने की जद्दोजहद के बाद स्मार्ट सिटी का प्रस्ताव तैयार करने केलिए प्रशासन ने जो कंसल्टेंट नियुक्त किया वह बीच में ही छोड़ कर चला गया। स्थिति ऐसी थी कि उस समय दोबारा कंसल्टेंट नहीं रखा जा सकता था। बाद में सीआईआई की मदद से अधिकारियों ने प्रस्ताव तैयार किया।
-बार-बार बढ़ाई गई तिथि
माई गव पोर्टल पर निबंध लेखन प्रतियोगिता और कई अन्य गतिविधियों केलिए तिथि बार-बार बढ़ाई जाती रही। फाइनल प्रस्ताव पर लोगों को अपनी प्रतिक्रिया देने का भी कम समय मिला। प्रस्ताव भेजने से महज दो दिन पहले इसे पोर्टल पर डिस्प्ले किया गया।
-अंतिम तिथि को प्रस्ताव कराया जमा
कहां चंडीगढ़ प्रशासन नवंबर 2015 के आखिर तक प्रस्ताव शहरी विकास मंत्रालय केपास जमा करवाने की बात करता रहा। जबकि प्रस्ताव अंतिम तिथि यानी 15 दिसंबर 2015 को जमा हो पाया।
कोट्स...
स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में कहां नंबर कम मिले अभी इसका पता नहीं चला है। लेकिन हाउस टैक्स और कम राजस्व उत्पत्ति भी नंबर कम आने का कारण हो सकती हैं। हाउस टैक्स का पिछले तीन साल का ब्यौरा मांगा गया था। जबकि चंडीगढ़ में जद्दोजहद केबाद प्रस्ताव भेजने से कुछ महीने पहले ही इसे लगाया जा सका। सिटीजन चार्टर भी समय रहते लागू नहीं हो सका। फरवरी में इसे हर हालत में लागू करने केआदेश जारी किए गए हैं।
अनुराग अग्रवाल, मिशन डायरेक्टर स्मार्ट सिटी कम गृह सचिव, चंडीगढ़ प्रशासन।