रिसर्च वर्क में पीजीआई लगातार पिछड़ रहा है। संस्थान से जुड़े लोग इसकी वजह भी पीजीआई में भाई-भतीजावाद को बताते हैं। ट्राइसिटी में करीब एक दर्जन रिसर्च इंस्टीट्यूट हैं। हाल यह है कि पीजीआई ही इनमें सबसे पिछड़ा है। रिसर्च का स्तर दुनिया में इस आधार पर मापा जाता है कि कितने टॉप जरनल्स में संस्थान के डाक्टरों के रिसर्च प्रकाशित हुए हैं। इनमें नेचर जरनल, न्यू इंग्लैंड जनरल आफ मेडिसिन और लान्सेट मुख्य जरनल हैं। ये तीनों ही चिकित्सा क्षेत्र के प्रमुख जरनल माने जाते हैं। हालांकि नेचर जरनल में मुख्य रूप से बेसिक साइंटिस्ट की रिसर्च प्रकाशित होती है, लेकिन इनमें मेडिकल इंस्टीट्यूट की बेहतरीन रिसर्च को छपने का मौका दिया जाता है। हर जरनल की प्रतिष्ठा उसके इंपैक्ट फैक्टर से आंकी जाती है।
नेचर जरनल में पीजीआई
इसका इंपैक्ट फैक्टर 42.35 है। इसमें पीजीआई की सिर्फ दो ही रिसर्च प्रकाशित हुईं हैं। इनमें न्यूरो सर्जरी के प्रोफेसर केके मुखर्जी, डिपार्टमेंट आफ एक्सपेरीमेंटल मेडिसिन एंड बायोटेक्नोलॉजी के प्रोफेसर मधु खुल्लर व कार्डियोलाजी के अजय बहल की रिसर्च प्रकाशित हुई हैं। एम्स के तीन शोध इसमें प्रकाशित हुए हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी की बात करें तो उसके 88 आर्टिकल, नाइपर के पांच, आईआईएसईआर मोहाली के 11 शोध प्रकाशित हो चुके हैं।
न्यू इंग्लैड जनरल आफ मेडिसिन में पीजीआई
क्लीनकल डाक्टरों के लिए यह जरनल सबसे महत्वपूर्ण है। इसका इंपैक्ट फैक्टर 54 है। इसमें सिर्फ पीजीआई के डिपार्टमेंट आफ कम्यूनिटी मेडिसिन के एचओडी प्रोफेसर राजेश कुमार की रिसर्च पब्लिश हुई है। पिछले साल प्रकाशित रिसर्च में 17 देशों में कार्डियोवस्कुलर रिस्क के खतरे को बताया गया था।