क्रिकेट ग्राउंड पर अपने लंबे छक्कों केलिए मशहूर नवजोत सिद्धू सियासत की पिच पर बोल्ड हो गए। कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे सियासत के दिग्गज को खुली चुनौती देना उन्हें भारी पड़ गया। एक महीने से ज्यादा चले सियासी ड्रामे के बाद आखिर सिद्धू ने इस्तीफा दे दिया।
सीम और सिद्धू के बीच शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है। उनकी कांग्रेस में एंट्री भी राहुल गांधी के जरिये हुई थी। सिद्धू बड़ी-बड़ी उम्मीदें लेकर कांग्रेस में आए थे पर कैप्टन ने उन्हें नंबर-टू भी नहीं बनने दिया।
सिद्धू अपने बयान और काम से लगातार कैप्टन केलिए मुसीबत बनते रहे। फिर नगर निगमों के मेयर बनाते समय उनसे पूछा तक नहीं गया तो फासला और बढ़ गया। पाकिस्तान जाकर सेना अध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा को जफ्फी डालने की कैप्टन ने सार्वजनिक तौर पर आलोचना की। लेकिन सिद्धू अपने स्टैंड पर कायम रहे।
पिछले साल हैदराबाद में सिद्धू ने कह दिया कि उनके कैप्टन तो राहुल गांधी हैं और वही कैप्टन अमरिंदर के भी कैप्टन हैं। दोनों के बीच तल्खी लगातार बढ़ती गई। लेकिन लोकसभा चुनाव में बात बहुत बढ़ गई। सिद्धू पंजाब में प्रचार के लिए कहीं नहीं गए। सिद्धू दंपती ने आरोप लगाया कि कैप्टन ने उन्हें चंडीगढ़ से लोकसभा का टिकट नहीं लेने दिया।
फिर 17 मई बठिंडा में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की चुनावी रैली में नाम लिए बगैर सिद्धू ने कहा कि यहां फ्रेंडली मैच चल रहा है। तभी बेअदबी के केस में बादलों पर परचा नहीं दर्ज किया जा रहा है। सार्वजनिक तौर पर इस बयान के बाद जंग निर्णायक दौर में पहुंच गई। उस समय तो कैप्टन ने सिर्फ इतना ही कहा था कि सिद्धू को कुछ कहना था तो कम से कम यह उचित समय नहीं था।
वह पार्टी प्लेटफार्म पर कह सकते थे। इससे नुकसान होगा। वह महत्वाकांक्षी हैं, शायद सीएम बनना चाहते होंगे। उसके बाद चुनाव नतीजों ने खुद ही सारी स्क्रिप्ट लिख दी। सिद्धू की आखिरी उम्मीद राहुल गांधी कम सीटें आने के कारण कमजोर हो चुके थे। कैप्टन आठ सीटें जिताने के बाद मजबूत होकर उभरे।
वहीं, सिद्धू का हर समय साथ देने वाले प्रदेश प्रधान सुनील जाखड़ खुद चुनाव हार चुके थे। नतीजे आते ही कैप्टन ने कहा कि सिद्धू के निकाय विभाग के खराब प्रदर्शन के कारण कांग्रेस शहरी इलाकों में हारी। जबकि, यह पार्टी की रीढ़ है। वहीं, सिद्धू ने प्रेस कांफ्रेंस कर विभाग की उपलब्धियां बताईं, कहा-उन्हें बेवजह निशाना बनाया जा रहा है।
आखिर छह जून को सीएम ने उनका विभाग बदल दिया। सिद्धू की आखिरी उम्मीद राहुल ने खुद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद सिद्धू के पास दो ही रास्ते थे, इस्तीफा दें या फिर कड़वा घूंट पीकर कैप्टन के निर्देश पर चलें।