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Chandigarh News: शिवमूर्ति बोले - लेखक को जिंदगी के सरोकार से टकराना चाहिए

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चंडीगढ़। लेखक को जिंदगी के सरोकार से टकराना चाहिए। पहले दरबारी कवि होते थे। चारण होते थे। वे स्वर्णमुद्राओं के लिए लिखते थे। क्या लेखक को बिकना चाहिए। लेखक का धर्म आम जन के साथ खड़ा होना है। उनके दुख तकलीफों को लिखें। मनोरंजन के लिए नहीं। ये बातें सेक्टर-16 स्थित पंजाब कला भवन में मंगलवार को लखनऊ से पहुंचे मुख्य अतिथि कथाकार शिवमूर्ति ने पहले आधार सम्मान के अवसर पर कहीं। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मश्री सुरजीत पातर और साहित्यकार जंग बहादुर गोयल ने की। अध्यक्ष मंडल में लुधियाना पंजाबी अकादमी के अध्यक्ष डॉ. लखविंदर जोहल भी उपस्थित रहे।
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पद्मश्री सुरजीत पातर ने कहा कि पंजाबी कभी दरबारी भाषा नहीं रही। उन्होंने अपने संबोधन में कवितामय तरीके से लेबनानी-अमेरिकी कलाकार, कवि व न्यूयॉर्क पेन लीग के लेखक खलील जिब्रान, सिखों के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव, अंग्रेजी के कवि, काव्यात्मकता के विद्वान नाटककार शेक्सपियर का उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी।
आधार प्रकाशन के 34वें स्थापना दिवस पर पंजाब कला भवन में प्रख्यात कथाकार राजकुमार राकेश को पहले आधार सम्मान से नवाजा गया। राजकुमार राकेश हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के गांव चम्याणु के रहने वाले हैं। इस मौके पर राकेश ने अपने गांव का भी जिक्र किया।
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शिवमूर्ति ने राजा रंतिदेव की कहानी सुनाते कहा कि राजा ने अकाल के समय खजाना और अन्न का भंडार खोल दिया। उनका काम सराहा गया। इस पर उन्हें स्वर्ग से बुलावा आया तो उन्होंने चाहा कि प्राणी का दुख समाप्त हो जाए। एक लेखक का उद्देश्य भी यही होना चाहिए। अन्याय, शोक, दुख, प्रताड़ना और परेशानी को कम करने के लिए लिखें। लेखक स्थायी रूप से सत्ता से प्रतिपक्ष होता है। लेखकों को दुख उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। पुरस्कार, पद और प्रतिष्ठा से हमेशा दूर रहना चाहिए। लेखक कभी न बिकें। पूरा विश्व साहित्य हमारा है। एक समय ऐसा आएगा जब शिक्षा का बजट रक्षा बजट के बराबर होगा। उन्होंने कहा कि हमारा स्वर्ग तो पुस्तकालयों में है।
जंग बहादुर गोयल ने साहित्य शिरोमणि गुरदयाल सिंह का उदाहरण देते कहा कि किताब लिखना एक दुष्कर कार्य है लेकिन समाज में बदलाव उसी से होगा। दिल्ली के जेएनयू से आए डॉ. देवेंद्र चौबे ने कहा कि बेहतर जिंदगी का रास्ता किताबों से निकलता है। महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से से आए डॉ. अमरेंद्र कुमार ने कहा कि उपन्यास किस प्रकार से लोकतांत्रिक चेतना का संवाहक होता है यह बात राजकुमार राकेश के कथानक में हमें देखने को मिलती है। राकेश बड़े लेखकों की भांति अपने क्षेत्र के छोटे-बड़े लोगों को अपने उपन्यास का किरदार बनाकर पाठकों के समक्ष रखते हैं, जिससे उनकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास का परिचय होता है।
इस मौके पर राजकुमार राकेश ने बड़ी विनम्रता से निर्णायक मंडल के प्रति आभार व्यक्त किया और अपने लेखन के तजुर्बों को लोगों के सामने रखा। राजकुमार राकेश और अंकित नरवाल को विशेष तौर पर सम्मानित किया गया। कनाडा से आए पृथ्वी राज कालिया ने उनकी संस्था की ओर से प्रकाशित पुस्तकें देश निर्मोही को भेंट कीं। इस दौरान राजकुमार और प्रियंवद की दो-दो पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। बठिंडा के जसपाल मानखेड़ा के पंजाबी से हिंदी में अनुवादित उपन्यास का विमोचन भी किया गया। महेंद्र कुमार सानी ने राजकुमार राकेश का प्रशस्ति पत्र पढ़ा। गुरबख्श मोंगा ने अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। मंच संचालन डॉ. आशा भंडारी ने किया।
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