किसान संघर्ष ने शिअद को दिया मौका
शिअद की सियासत सदा केंद्र सरकार के विरोध के आसपास घूमती रही है। 1997 में पंजाब के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिलने और भाजपा के साथ हुए राजनीतिक समझौते के बाद अकाली दल के संघर्ष की धार सत्ता ने कुंद कर दी थी। लेकिन किसान संघर्ष ने शिअद को 23 वर्ष बाद एक बार फिर केंद्र से संघर्ष करने का मौका दिया है।
अपनी पंथक शक्ति गंवा चुके शिअद को हालांकि अब तक किसान संघर्ष का कोई भी सियासी लाभ नहीं मिला है। पंथक वोट बैंक में शामिल किसानों को अपने पाले में लाने के लिए बादल ने पद्म विभूषण वापस करने की घोषणा की, लेकिन इससे भी शिअद को कोई भी पंथक सहानुभूति नहीं मिली।
शिअद अध्यक्ष सुखबीर बादल ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) अध्यक्ष बीबी जागीर कौर की पंथक छवि को शिअद के पक्ष में भुनाने के लिए कवायद शुरू की है। इसके तहत भारत बंद की कॉल को एसजीपीसी ने पूरा दिया और सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के हजूरी रागी सिंहों ने भी किसान आंदोलन के समर्थन करने की घोषणा की। शिअद सिखों की धार्मिक शख्सियतों के माध्यम से इस आंदोलन को सिख संघर्ष के साथ जोड़ने की रणनीति पर काम करता दिख रहा है।