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कारगिल के एक योद्धा, जिन्होंने शादी की उम्र में पाई शहादत, गोली लगी पर गिरा नहीं

Thu, 27 Jul 2017 09:25 AM IST
अमित रूखाया/अमर उजाला, फतेहाबाद
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कारगिल युद्ध का शहीद योद्धा मनोहर लाल
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वो अपने मां-बाप का लाडला था, लेकिन शादी की उम्र में उसकी शहादत ने उसे देश का लाडला बेटा बना दिया। ये हैं हरियाणा के फतेहाबाद का बहादुर बेटा मनोहर लाल। दुश्मन की गोली लगने के बाद भी उसने कदम पीछे नहीं हटाए, बल्कि तब तक दुश्मनों से जंग लड़ता रहा, जब तक जिस्म की आखिरी सांस खर्च नहीं हो गई। उम्र थी महज 23 साल, जिस उम्र में नौजवान घोड़ी चढ़ने के सपने देखते हैं, उस उम्र में ढाणी डुल्ट का मनोहर लाल 18 जून 1999 को तिरंगे को सीने से लगाकर चार कंधों पर शान से अपने गांव पहुंचा था।
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अफसोस बस इतना था, परिवार और गांव वालों ने अपने उस बहादुर बेटे को आखिरी बार देखा था। उस दिन अग्नि में समाने से पहले वह नौजवान अपना और अपने खानदान का नाम फतेहाबाद के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिख गया था। मनोहर की शहादत के 18 बरस बाद परिजनों को सरकार से गिला तो कुछ नहीं है, लेकिन बेटे की प्रतिमा फतेहाबाद में लगाने की हसरत आज तक दिल में दबी है, जिसे कोई अफसर सुनना नहीं चाहता।

29 अप्रैल 1995 को सेना में बतौर सिपाही भर्ती हुआ मनोहर लाल सेना में एक अधिकारी बनकर अपने दादा और पिता का नाम और रोशन करना चाहता था। फौज में जाने की प्रेरणा उसे अपने दादा छाजूराम से ही मिली जो खुद फौज में रह चुके थे। सेना में अफसर बनने की उसकी ललक के कारण उसने पूरी तैयारी की और एनडीए की परीक्षा को पास भी किया। इस बीच कारगिल के द्रास सेक्टर में लड़ाई छिड़ गई। इस लड़ाई में पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए 13 जून 1999 को फतेहाबाद का यह वीर जवान मनोहर लाल शहीद हो गया।
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शहादत के बाद पहुंचा लेफ्टिनेंट के पद पर ज्वॉइनिंग का लैटर

कारगिल युद्ध का शहीद योद्धा मनोहर लाल
किस्मत भी देखिए, क्या खेल दिखाती है, शहीद मनोहर लाल जितना समय जीवित रहे, इस सपने के साथ जिए कि फौज में अफसर बनना है। यह सपना पूरा भी हुआ, पर तब जब वे देश पर कुर्बान हो चुके थे। लेफ्टिनेंट के पद पर ज्वाइनिंग लैटर उनकी शहादत के बाद घर पहुंचा। कारगिल में द्रास सैक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों के साथ जंग के मैदान में शहीद मनोहर लाल ने गजब की बहादुरी दिखाई।

उसके पार्थिव शरीर के साथ आए उसके साथियों ने बताया था कि मनोहर लाल ने शौर्य का परिचय देते हुए कई पाकिस्तानी घुसपैठियों को ठिकाने लगाया। इस बीच उसे दुश्मन की एक गोली आकर लगी, लेकिन इसके बावजूद वो डिगा नहीं और दुश्मनों से जा भिड़ा। वह तब तक उनसे लड़ता रहा, जब तक सांस ने साथ नहीं छोड़ा। साथियों ने बताया कि शहीद मनोहर लाल के अंतिम शब्द थे 'भारत माता की जय'। और इस जयघोष के साथ ही जिले का ये वीर सिपाही वीरगति को प्राप्त हो गया।

उसके बाद सरकार ने उनके परिवार का पूरा ख्याल रखा। सरकार की ओर से शहीद के नाम पर गैंस एजेंसी अलॉट करने के साथ साथ उनके भाई को भी सरकारी नौकरी दी गई। लेकिन तत्कालीन सरकार द्वारा किए गए कुछ वादे अभी तक अधूरे हैं। मसलन सरकार द्वारा तब ऐलान किया गया था कि शहीद के नाम पर कालेज का नामकरण होगा। इसके अलावा उनके पिता रामेश्वर ने दरख्वास्त की थी कि उनके शहीद बेटे की एक प्रतिमा शहर में भी लगाई जाए लेकिन दोनों ही जगह सिर्फ आश्वासन ही मिले।
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